Nalanda Water Management: कभी शिक्षा का वैश्विक केंद्र रहा नालंदा, अब अपने अद्भुत जल प्रबंधन और नगर नियोजन के लिए भी चर्चा में है। हाल ही में हुए एक गहन अध्ययन ने प्राचीन नालंदा महाविहार के आसपास 43 तालाबों और जलाशयों की पहचान की है, जो उस दौर की विकसित जल प्रबंधन प्रणाली का प्रमाण है। यह खोज सिर्फ शिक्षा ही नहीं, बल्कि उस समय के उन्नत शहरी विकास की भी कहानी बताती है।
उपग्रह चित्रों ने खोला जल नेटवर्क का राज
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (पटना अंचल) के पूर्व अधीक्षणविद डॉ. सुजीत नयन और शोधकर्ता अर्पित तिवारी के साझा अध्ययन से ये नए तथ्य सामने आए हैं। उन्होंने पुरातात्विक साक्ष्यों, उपग्रह चित्रों और ऐतिहासिक स्रोतों का विश्लेषण किया। इस अध्ययन में पंचाना नदी से दिघी पोखर तक करीब 10 किलोमीटर लंबी एक प्राचीन जलधारा के अवशेष भी मिले हैं, जो नालंदा के जल प्रबंधन की गहराई को दर्शाता है।
डॉ. सुजीत नयन के अनुसार, ‘सुदूर संवेदन और जीआइएस आधारित अध्ययन में कार्टोसैट-1 उपग्रह चित्रों का विश्लेषण किया गया, जिसमें पंचाना नदी और दिघी पोखर के बीच एक प्राचीन नदी धारा के अवशेष का पता चला। अनुमान है कि यह जलधारा पंचाना नदी से अलग होकर उत्तर-पश्चिम दिशा में करीब 10 किलोमीटर तक बहती रही होगी।’
इत्सिंग के विवरण में भी था स्वच्छ जलाशयों का जिक्र
अध्ययन के अनुसार, प्राचीन नालंदा और उसके आसपास कुल 43 प्राचीन तालाबों और जलाशयों की पहचान हुई है। यह साबित करता है कि उस समय जल संग्रह और उसके उपयोग पर विशेष ध्यान दिया जाता था। स्थानीय मान्यताओं में तो नालंदा को 52 जलाशयों से घिरा हुआ बताया जाता है। सातवीं शताब्दी में नालंदा आने वाले चीनी यात्री इत्सिंग ने भी अपने विवरण में 10 से अधिक बड़े तालाबों का उल्लेख किया था। उन्होंने इन तालाबों के स्वच्छ पानी, नीले कमल और कनक पुष्पों का भी वर्णन किया था, जो प्राचीन नालंदा में उन्नत जल प्रबंधन की पुष्टि करता है।
समय के साथ बदल गया जलाशयों का स्वरूप
दुखद है कि लंबे समय की उपेक्षा, तालाबों में गाद जमने, भू-उपयोग में बदलाव और पर्यावरणीय परिवर्तनों के कारण कई प्राचीन जलाशयों का मूल स्वरूप बदल गया है। कुछ जगहों पर तो ये जलाशय अब कृषि भूमि और धान के खेतों में तब्दील हो चुके हैं। इसके बावजूद, मिले साक्ष्य प्राचीन नालंदा की गौरवशाली विरासत को समझने में महत्वपूर्ण हैं।
स्नान घाट और सीमा दीवार के अवशेष भी मिले
अध्ययन में जुआफरडीह और दामनखंडा में देहर पोखर के पास पकी ईंटों से निर्मित एक प्राचीन स्नान घाट के अवशेष भी मिले हैं। इसकी लंबाई लगभग आठ मीटर और चौड़ाई चार मीटर बताई गई है। यह दर्शाता है कि जलाशयों का उपयोग केवल जल संग्रह तक सीमित नहीं था, बल्कि उनसे जुड़े सार्वजनिक उपयोग के स्थल भी विकसित थे। दामनखंडा में करीब 30 मीटर लंबी ईंट निर्मित सीमा दीवार के अवशेष भी मिले हैं, जिसे नालंदा महाविहार की प्राचीन सीमा का हिस्सा माना जा रहा है। देहर पोखर और इंद्र पोखर के बीच आंतरिक जल संपर्क के प्रमाण भी मिले हैं, जिससे पता चलता है कि प्राचीन नालंदा क्षेत्र में अलग-अलग जलाशयों को जोड़ने वाली एक व्यवस्थित प्रणाली मौजूद थी। यह अध्ययन प्राचीन नालंदा के नगर नियोजन और कुशल जल प्रबंधन को समझने में नई दिशा प्रदान करता है।







