Bihar Election Commission: बिहार में आगामी चुनावों की तैयारी के बीच चुनाव आयोग के भीतर चल रहे गहरे मतभेद अब सार्वजनिक हो गए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज के तरीके को लेकर अन्य दो चुनाव आयुक्तों, विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू, के साथ विवाद इतना बढ़ गया कि उत्तर प्रदेश में उनका तय सरकारी कार्यक्रम अचानक रद्द कर दिया गया। इस घटना ने आयोग की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ज्ञानेश कुमार का मेरठ और वाराणसी में होने वाला सरकारी कार्यक्रम 21 सितंबर को ही स्थगित कर दिया गया था। हालांकि, कार्यक्रम रद्द होने की आधिकारिक जानकारी गुरुवार की शाम को जारी की गई, लेकिन मेरठ में चल रही तैयारियां तीन दिन पहले, यानी 21 सितंबर को ही रोक दी गई थीं। लखनऊ से उसी दिन दौरा स्थगित होने का संकेत मिल गया था। अधिकारियों ने मौखिक रूप से तैयारियां रोकते हुए कार्यक्रम के टलने की जानकारी दी थी।
उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय की तरफ से जारी पत्र में भी 21 सितंबर की तारीख अंकित है। इस पत्र के साथ आयोग की ओर से उसी दिन आए एक ईमेल का प्रिंट भी संलग्न है। एसवीईईपी के सेक्शन अधिकारी सौरभ राना ने यूपी के सीईओ कार्यालय को यह ईमेल भेजा था। दो पंक्तियों के इस ईमेल में सिर्फ कार्यक्रम स्थगित होने की सूचना दी गई है, लेकिन इसके पीछे का कोई कारण नहीं बताया गया।
CEC ज्ञानेश कुमार पर मनमानी के गंभीर आरोप
इस पूरे विवाद ने तब और तूल पकड़ा जब अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने 23 और 24 सितंबर को लगातार दो दिनों तक रिपोर्ट प्रकाशित की। इन रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने फैसलों में मनमानी कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 14 से अधिक बार ज्ञानेश कुमार के फैसलों और आदेशों पर लिखित में आपत्ति दर्ज कराई है। यह भी दावा किया गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने कई महत्वपूर्ण निर्णय और आदेश संधू व जोशी को बिना जानकारी दिए ही जारी किए।
अंग्रेजी अखबार में यह रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर हमला तेज कर दिया। कॉकरोच जनता पार्टी ने तो ज्ञानेश कुमार से 48 घंटे के भीतर इस्तीफा देने की मांग करते हुए आंदोलन का अल्टीमेटम भी दे दिया है। आयोग ने इस रिपोर्ट पर सफाई जारी की है, लेकिन आरोपों से सीधे तौर पर इनकार नहीं किया गया है।
चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्था के भीतर इस तरह के मतभेद सामने आना चिंताजनक है। यह घटना न केवल आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि आगामी चुनावों की निष्पक्षता को लेकर भी बहस छेड़ सकती है। अब देखना होगा कि आयोग इस विवाद को कैसे सुलझाता है और क्या मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगे आरोपों पर आगे कोई कार्रवाई होती है।







