Bihar Old Age Homes: एक ओर देशभर में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना का महापर्व नवरात्रि धूम-धाम से मनाया जा रहा है, वहीं बिहार के वृद्धाश्रमों में कई माताएं आज भी अपने बच्चों की राह तक रही हैं. उनकी आंखों में एक ही उम्मीद है कि शायद उनका बेटा उन्हें लेने आएगा और हाथ थामकर वापस घर ले जाएगा. उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर इन माताओं के पास रहने, खाने और देखभाल की पर्याप्त व्यवस्था तो है, लेकिन अपने परिवार का साथ और अपनों का प्यार उन्हें नहीं मिल पाता.
यहां रह रहीं कुछ माताएं अपने बेटों की तस्वीर याद कर आंसू बहाती हैं, तो कुछ हर सुबह भगवान से अपने परिवार के लौट आने की प्रार्थना करती हैं. यह स्थिति समाज के सामने कई गंभीर सवाल खड़े करती है.
बेटों की राह तकती नम आंखें
‘हम घर कब जाएंगे?’ यह सवाल पटना के वृद्धाश्रम में रह रही एक मां की आंखों में आज भी साफ झलकता है.
वृद्धाश्रमों में रह रही माताओं का यह सवाल सिर्फ एक आवाज नहीं, बल्कि उन सभी बुजुर्गों का सामूहिक दर्द है, जिन्हें उनके अपने बच्चों ने छोड़ दिया है. नवरात्रि के पावन अवसर पर यह विरोधाभास और भी गहरा हो जाता है, जब लोग एक ओर देवी मां की पूजा करते हैं और दूसरी ओर अपनी जन्म देने वाली मां को अकेलेपन में छोड़ देते हैं.
वृद्धाश्रमों में महिलाओं की बढ़ती संख्या: एक गंभीर सामाजिक तस्वीर
बिहार के विभिन्न वृद्धाश्रमों से सामने आए आंकड़े एक चिंताजनक सामाजिक तस्वीर पेश करते हैं. इन आंकड़ों के अनुसार, कई वृद्धाश्रमों में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या अधिक है. यह दर्शाता है कि समाज में बुजुर्ग महिलाओं को अकेलेपन और परित्यक्ता का सामना ज्यादा करना पड़ रहा है.
| शहर | कुल बुजुर्ग | महिलाएं |
|---|---|---|
| पटना (गुलजारबाग) | 97 | 64 |
| भागलपुर | 35 | 22 |
| गया | 92 | 65 |
| मुजफ्फरपुर | 13 | 7 |
| पूर्णिया | 98 | 55 |
यह तालिका स्पष्ट करती है कि इन आश्रयों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से काफी अधिक है, जिससे उनके जीवन के संघर्ष और अकेलेपन की गहराई का पता चलता है.
अकेलेपन का दर्द और संघर्ष की कहानियां
वृद्धाश्रमों में रहने वाली बड़ी संख्या में महिलाएं विधवा हैं. उनके जीवन की कहानियां संघर्ष, अकेलेपन और अपनों से बिछड़ने के दर्द से भरी हुई हैं. किसी मां का बेटा पुलिसकर्मी है, तो किसी के बेटे ने ही उसे जान से मारने की धमकी दे डाली. इन माताओं के पास रहने, खाने और देखभाल की व्यवस्था तो है, लेकिन भावनात्मक सहारा और अपनेपन की कमी उन्हें हर पल कचोटती है.
यह स्थिति समाज को अपनी प्राथमिकताओं और पारिवारिक मूल्यों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करती है. इन माताओं का इंतजार कब खत्म होगा, यह सवाल आज भी अनुत्तरित है.






