Muzaffarpur News की एक ऐसी कानूनी दास्तान सामने आई है, जो न्याय प्रक्रिया में सुस्ती और प्रशासनिक लापरवाही की पोल खोलती है। बिहार के Muzaffarpur जिले में लगभग पांच दशकों से चल रहे एक अजीबोगरीब रिश्वतखोरी के मामले को आखिरकार विशेष निगरानी कोर्ट ने बंद कर दिया है। पुलिस अधिकारियों की गंभीर उदासीनता के चलते इतने लंबे समय तक चली सुनवाई बिना किसी तार्किक निष्कर्ष के ही समाप्त हो गई, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है।
1978 के उस चर्चित आवेदन की पूरी कहानी
यह पूरा घटनाक्रम साल 1978 का है, जब पारू थाने के अंतर्गत आने वाले गोपालपुर गांव निवासी अवधेश प्रसाद सिंह ने अपने हथियार का लाइसेंस बनवाने के लिए आधिकारिक आवेदन दिया था। नियमानुसार इस आवेदन के सत्यापन की जिम्मेदारी उस समय के संबंधित थाने के प्रभारी बच्चा सिंह को सौंपी गई थी। लेकिन आरोप लगा कि प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के एवज में रिश्वत की मांग की गई, जिसके बाद कानूनी शिकंजा कसा था।
अनुसंधान अधिकारी की लापरवाही से खत्म हुआ केस
लंबे समय तक चली इस कानूनी खींचतान के बाद हाल ही में विशेष निगरानी अदालत ने इस मामले में बड़ा कदम उठाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच अधिकारी की तरफ से समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं की गई और अनुसंधान में भारी सुस्ती बरती गई। पुलिस की इसी सुस्ती और लचर कार्यशैली का नतीजा यह रहा कि इतने साल पुरानी कानूनी लड़ाई का अंत बिना दोषी को सजा मिले ही बंद होने के साथ हुआ।







