जब धरती पर आग बरसी सोलह सौ गांव राख कर दिए गए…वह वर्ष था 1784 का। पहाड़ों की गोद में बसने वाली पहाड़िया और संथाल बस्तियों पर वह समय टूट पड़ा, जिसे इतिहास ने दमन कहा और लोक ने वेदना।

अगस्टस क्लीवलैंड—ईस्ट इंडिया कंपनी का वह अफसर, जिसने पहाड़ियों को “सभ्य” करने का ठेका लिया था—13 जनवरी को तिलका मांझी के तीर का शिकार हुआ। कहा जाता है, तीर लगा, घाव गहरा था। पर कुछ सरकारी पन्ने चीखते हैं कि वह तीर से नहीं, हुगली के मुहाने पर बुखार से मरा। मृत्यु चाहे जैसी भी हो, अंग्रेजों के लिए वह बहाना बन गई।

क्लीवलैंड की मौत के बाद कैप्टन आयरकूट के नेतृत्व में सेना उतरी। बदले की आग में राजमहल की पहाड़ियां जल उठीं। वसुधा ढगमवार अपनी पुस्तक Role and Image of Law in India: The Tribal Experience में लिखती हैं कि उस दमन में लगभग सोलह सौ गांव राख कर दिए गए।
पर इतिहास के सरकारी दस्तावेज चुप हैं। उनमें “तिलका मांझी” के नाम तो मिलते हैं, पर सोलह सौ गांवों का लेखा नहीं। यह संख्या कंपनी के अप्रकाशित कागजों और आदिवासियों की मौखिक स्मृतियों के संगम से निकली है। जहां कागज खामोश हो जाते हैं, वहां लोक की स्मृति बोलती है।
तिलका मांझी पकड़े गये। 13 जनवरी 1785 को भागलपुर के फांसीघाट पर उन्हें लटकाया गया। एक विद्रोह थमा, पर उसकी चिंगारी आदिवासी स्मृति में आज भी धधकती है।

ढगमवार की लेखनी में यह केवल युद्ध नहीं, कानून और सत्ता का वह चेहरा है जो आदिवासी के अनुभव में हिंसा बनकर उतरा। सरकारी फाइलें इसे विद्रोह-दमन कहती हैं, पर गांवों की राख कहती है—यह उपनिवेश की वह नीति थी, जहां न्याय तलवार की धार पर लिखा गया।
“Role and Image of Law in India: The Tribal Experience” – Vasudha Dhagamwar
ये किताब भारत के 3 आदिवासी समुदायों के साथ कानून और राज्य के रिश्ते पर है:
महाराष्ट्र के भील
झारखंड के संथाल
झारखंड-बिहार के पहाड़िया/सौरा पहाड़िया
ढगमवार वकील और एक्टिविस्ट हैं, तो किताब में लीगल एथ्नोग्राफी के साथ एक्टिविस्ट इंटरवेंशन भी है। मुख्य बातें ये हैं:
ऐतिहासिक बेदखली और ब्रिटिश दमन
पहाड़िया/सौरा पहाड़िया: राजमहल पहाड़ियों में ईस्ट इंडिया कंपनी के सैन्य अभियान। 1770-1785 के तिलका मांझी विद्रोह का विस्तार से जिक्र।
1600 गांव जलाने की घटना: – ढगमवार लिखती हैं कि क्लीवलैंड पर हमले के बाद ब्रिटिश सेना ने जवाबी कार्रवाई में पहाड़िया-संताल इलाकों के लगभग 1600 गांव जला दिए।
किताब में तिलका मांझी को आदिवासी प्रतिरोध का प्रतीक बताया गया है। पकड़ने और फांसी की पूरी कहानी है।
भूमि और जंगल से बेदखली
ब्रिटिश जमींदारी सेटलमेंट, टेनेंसी एक्ट और वन कानूनों ने आदिवासियों को उनकी पारंपरिक जमीन और जंगल से कैसे बेदखल किया।
संथाल परगना में सर्वे और सेटलमेंट, महाजनों-सामंतों का शोषण।
आंतरिक कानूनी संरचनाएं
भील, संथाल और पहाड़िया की पारंपरिक न्याय व्यवस्था: “बिटलाहा” जैसी प्रथाएं, पंचायत, मांझी सिस्टम।
ब्रिटिश कानून ने इनको कैसे नकारा या बदल दिया।
आजादी के बाद भी निरंतर दमन

आजादी के बाद भी आदिवासी “बाहरी लोगों” द्वारा चलाए जाते रहे।
पुलिस, वन विभाग, भू-माफिया और कोर्ट सिस्टम आदिवासियों के लिए उत्पीड़क बन गया।
ढगमवार ने कई PIL लिखीं और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। किताब के आखिरी हिस्से में उनके कानूनी हस्तक्षेप केस स्टडी के रूप में हैं।
तीन दुनिया: व्यवहार, रवैया, धारणा
लास्ट चैप्टर में वो बताती हैं कि भील, संथाल और पहाड़िया तीन अलग “दुनिया” में रहते हैं:
कानून को वो बाहरी, शोषक और अमीरों के पक्ष में मानते हैं।
फिर भी ढगमवार का तर्क है कि कानून के अपने बताए लक्ष्य ही उसे न्याय के लिए बाध्य करते हैं।
कुल मिलाकर किताब आदिवासियों के नजरिए से भारतीय कानून को देखती है। प्राचीन-मध्यकाल से ब्रिटिश काल, और ब्रिटिश काल से आजादी के बाद तक कैसे आदिवासी बेदखल, शोषित और आपराधिक बनाए गए – ये मुख्य थीम है।








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