
अंग्रेजों की नीति ही यही थी — आदिवासी को आदिवासी से लड़वाओ। जो सबसे खूंखार था, उसे ही वर्दी पहना दो। जबरा पहाड़िया अंग्रेजी रिकॉर्ड में अलग व्यक्ति है। ब्रिटिश रिकॉर्ड के हिसाब से जबरा पहाड़िया यानी जौरा पहाड़िया अंग्रेजों के लिए काम कर चुका था।
अंग्रेजों के दस्तावेजों में उसे “Once a noted bandit” यानी कभी कुख्यात डाकू बताया गया है। बाद में वही जबरा पहाड़िया ब्रिटिश प्रशासन की सेवा में चला गया। ये वही दौर था जब Augustus Cleveland ने पहाड़िया युवकों से ‘हिल रेंजर्स‘ नाम की फौज बनाई थी। सबसे बड़े लुटेरे को ही कप्तान बनाकर मैदान के गाँवों की लूट रोकने की नीति अपनाई थी।
इतिहासकारों का मानना है कि जबरा पहाड़िया हिल रेंजर्स में अधिकारी या कम से कम ब्रिटिश एजेंट बन गया था। उसका काम था अपने ही पहाड़िया और संताल लोगों पर नजर रखना और विद्रोह को दबाना। इतिहासकारों में लंबा विवाद है। ‘जौरा/जबरा पहाड़िया = तिलकामांझी‘ वाला फॉर्मूला उतना सीधा नहीं है जितना स्कूल की किताबों में लिखा दिखता है।
विवाद की जड़ क्या है?
ब्रिटिश दस्तावेजों में 1784-85 के विद्रोह में दो नाम बार-बार आते हैं:
‘Jabra Pahadia‘ या ‘Joura Paharia‘, ‘Jawra Paharia‘ — ब्रिटिश रिकॉर्ड में उसे “एक समय कुख्यात डाकू” लिखा है, जो बाद में ब्रिटिश प्रशासन में नौकर हो गया था

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समस्या ये है: समकालीन ब्रिटिश रिकॉर्ड सीधे तौर पर ‘जौरा पहाड़िया = तिलका मांझी‘ नहीं कहते। इतिहासकार वर्मा ने तर्क दिया कि दोनों को एक मानना ‘दो अलग व्यक्तियों को जोड़ने की कोशिश‘ है।
लोककथा V/s दस्तावेजी सबूत
भागलपुर-संताल इलाके में पीढ़ियों से ये कहानी चली कि ‘जबरा पहाड़िया ही तिलकामांझी थे‘।
पर कुछ इतिहासकार कहते हैं:
तिलकामांझी संथाल थे, जबरा पहाड़िया पहाड़िया समुदाय से थे।
तिलका 1785 में फांसी चढ़े। जबरा के बारे में ब्रिटिश रिकॉर्ड कहते हैं वो बाद में ब्रिटिश नौकरी में चला गया था।
अगर जबरा ब्रिटिश नौकर बन गया, तो फांसी पर कौन चढ़ा? ये सवाल खड़ा होता है।
राजनीतिक कारण
झारखंड आंदोलन के दौरान तिलकामांझी को “पहला आदिवासी शहीद” कहा गया। उस वक्त “जबरा पहाड़िया = तिलका मांझी” वाली कहानी को बल मिला, ताकि स्थानीय नायक को और मजबूत ऐतिहासिक आधार मिले।
पर कुछ शोधकर्ता मानते हैं ये ‘इतिहास को भावना से जोड़ने‘ की कोशिश थी, दस्तावेजी सबूत से नहीं।
तिलकामांझी विश्वविद्यालय की स्थिति
TMBU खुद भी ‘तिलका मांझी‘ नाम का इस्तेमाल करता है, ‘जबरा पहाड़िया‘ नहीं। अगर दोनों एक होते तो विश्वविद्यालय नाम बदल चुका होता। ये भी अप्रत्यक्ष संकेत है कि अकादमिक हलकों में संदेह है।

इससे दो बातें साफ होती हैं—
अगर जबरा हिल रेंजर्स में था, तो वो तिलकामांझी नहीं हो सकता, क्योंकि तिलका ने उसी हिल रेंजर्स और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह किया था।
अंग्रेजों की नीति ही यही थी — ‘आदिवासी को आदिवासी से लड़वाओ‘। जो सबसे खूंखार था, उसे ही वर्दी पहना दो।
देशज टाइम्स का निचोड़—
सच ये है कि 1784-85 में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह हुआ, कलेक्टर क्लीवलैंड पर हमला हुआ, और एक आदिवासी नेता को फांसी दी गई। उस नेता का नाम लोक में ‘तिलकामांझी‘ चल पड़ा।







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