Jale Farming: बिहार के जाले प्रखंड के किसान इस वर्ष धान की खेती के लिए एक नई रणनीति अपना रहे हैं। संभावित कमजोर मॉनसून और सामान्य से कम बारिश की आशंका के चलते वे धान की पारंपरिक रोपाई की बजाय सीधी बुआई को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह कदम अल नीनो के प्रभाव को देखते हुए उठाया गया है, जिसकी जानकारी किसानों को सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से मिल रही है।
क्यों बदली जाले के किसानों ने धान की खेती की पद्धति?
जाले प्रखंड के किसानों का कहना है कि धान की रोपाई में बहुत अधिक पानी की आवश्यकता होती है, जबकि सीधी बुआई में पानी की खपत अपेक्षाकृत कम होती है। रतनपुर गांव के किसान राजा सहनी और मिंटू ठाकुर ने बताया कि पंपसेट के भरोसे बड़े पैमाने पर सिंचाई करना महंगा और मुश्किल काम है। वे अब कम पानी वाली खेती की पद्धति अपनाकर अपनी फसलों को बचाना चाहते हैं।




भूजल स्तर पर असर और किसानों की चिंता
किसानों ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लगातार पंपसेट चलाने से भूजल स्तर बुरी तरह प्रभावित होता है। कई बार तो इसका असर इतना गहरा होता है कि चापाकल भी पानी देना बंद कर देते हैं। सीधी बुआई में खेत में पहले से मौजूद नमी से ही फसल का विकास संभव हो जाता है और जरूरत पड़ने पर ही सीमित सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। इस तरीके से जल संरक्षण में भी मदद मिलती है।
संभावित कमजोर मॉनसून की आशंका के बीच, जाले क्षेत्र के कई किसान अब इसी पद्धति को अपनाकर अपनी फसलों को सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहे हैं। यह कदम न केवल उनकी लागत कम करेगा, बल्कि भविष्य में जल संकट से निपटने में भी सहायक सिद्ध होगा।







