Akhilesh Yadav Blue Uniform: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने छात्र संगठन के लिए एक नई वर्दी जारी की है। अब छात्र संगठन के कार्यकर्ता नीली टी-शर्ट और जींस के साथ सिर पर लाल टोपी पहने नजर आएंगे। अखिलेश यादव ने इस बदलाव पर टिप्पणी करते हुए कहा कि नई पीढ़ी की सोच नई है, इसलिए उनकी पोशाक भी नई होनी चाहिए। इससे पहले छात्र सभा के कार्यकर्ता लाल शर्ट या कुर्ता पहनते थे, लेकिन अब उन्होंने नीला रंग अपनाया है।
इस नई ‘नीली ड्रेस’ को लेकर सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला है। राजभर ने अखिलेश यादव को घेरते हुए कहा कि उन्होंने राष्ट्रीय सुहेलदेव सेना (RSS) की नकल तो कर ली है, लेकिन वैसा अनुशासन कैसे ला पाएंगे।
ओम प्रकाश राजभर, राष्ट्रीय अध्यक्ष, सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी: जिन अपराधियों को आपने राष्ट्रीय सुहेलदेव सेना की यूनिफॉर्म की कॉपी करके नीली ड्रेस पहनाई है, उन्हें उसी सुहेलदेव सेना की तरह का अनुशासन भी सिखाइए। नहीं सिखा सकते तो कम से कम एसी में बैठकर पीसी करते हुए उन्हें अपराध न करने की कसम तो खिलवा ही सकते हैं।
नीली वर्दी पर ओम प्रकाश राजभर का तीखा हमला
ओम प्रकाश राजभर का यह बयान समाजवादी पार्टी के इस कदम को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने अखिलेश यादव पर तंज कसते हुए कहा कि सिर्फ ड्रेस कॉपी करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि राष्ट्रीय सुहेलदेव सेना जैसा अनुशासन भी लाना होगा। राजभर ने सपा कार्यकर्ताओं को ‘अपराधी’ बताते हुए उन्हें एसी में बैठकर अपराध न करने की कसम खिलवाने की चुनौती भी दी।
नीली वर्दी पर यह राजनीतिक खींचतान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ‘राष्ट्रीय सुहेलदेव सेना’ ओम प्रकाश राजभर का एक महत्वाकांक्षी मिशन है। इस सेना के सैनिक नीली वर्दी और पीले बैज में दिखते हैं। समाजवादी पार्टी के छात्र संगठन के कार्यकर्ता भी अब नीले शर्ट में नजर आएंगे, जिससे दोनों के बीच समानता दिख रही है।
क्या है राजभर की ‘राष्ट्रीय सुहेलदेव सेना’ और अखिलेश की ‘छात्र सेना’ में अंतर?
ओम प्रकाश राजभर की राष्ट्रीय सुहेलदेव सेना (RSS) का गठन दिसंबर 2025 में हुआ था। इसके नीले ड्रेस पहने सैनिकों के हाथ में डंडा होता है। तब ओपी राजभर ने बताया था कि उनकी RSS का उद्देश्य समाज के शोषित और पिछड़े वर्गों को संगठित कर उनके अधिकारों के लिए जागरूक करना है। इसका मकसद युवाओं को महाराजा सुहेलदेव के राष्ट्रभक्ति के आदर्शों पर चलकर समाज सेवा और अनुशासन के लिए प्रशिक्षित करना भी है।
वहीं, अखिलेश यादव ने छात्रों के संगठनों को यह नई वर्दी सामाजिक क्रांति के लिए दी है। उनके छात्र लोहिया और मुलायम सिंह के सामाजिक मूल्यों का प्रचार करने के लिए गली-गली तक जाएंगे। इस संगठन का मुख्य मकसद गैरबराबरी को खत्म करना है। समाजवादी पार्टी का कहना है कि यह नीला रंग समाजवादी सोच, समानता और बहुजन समाज की पहचान से जुड़ा है।
अखिलेश यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी: यूनिफॉर्म समाजवादी मूल्यों की ही बात करती है। यूनिफॉर्म पहनावे के भेद से जन्म लेनेवाली गैरबराबरी को खत्म करके एकरूपता लाती है। इसीलिए यह समाजवाद के बराबरी के सिद्धांत को और भी मजबूत करती है।
पार्टी प्रवक्ता सुनील सिंह यादव ‘सजन’ ने भी कहा कि नीला रंग समानता और समाजवादी मूल्यों का प्रतीक है। उनका मानना है कि इसका मकसद उन वर्गों को साथ लाना है, जो दमन और अन्याय का सामना कर रहे हैं।
दलित राजनीति में नीले रंग का महत्व और सपा की रणनीति
भारत में नीले रंग को दलित समुदाय अपनी अस्मिता से जोड़कर देखते हैं। इसे सामाजिक क्रांति का रंग माना जाता है और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों से भी जोड़ा जाता है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने अपने झंडे और चुनाव चिन्ह में नीले रंग को प्रमुखता दी थी।
एडवोकेट रविंद्र सिंह: बहुजन समाज पार्टी ने आंबेडकर से प्रभावित होकर नीले रंग को चुना। नीला रंग, सामाजिक न्याय, समानता और आंबेडकरवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है। इसी वजह से नीले रंग की राजनीति शब्द अक्सर दलित और बहुजन समुदाय की राजनीतिक लामबंदी के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है।
दलित एक्टिविस्ट राम पराग ने भी बताया कि नीले रंग की राजनीति सिर्फ BSP तक सीमित नहीं रही है, बल्कि कई राज्यों में दलित संगठनों और अन्य राजनीतिक दलों ने भी इस रंग को अपनी पहचान से जोड़ा है, खासकर दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश में। भगवा रंग को हिंदुत्व और बीजेपी से, हरे रंग को मुस्लिम राजनीति से और नीले रंग को दलित राजनीति से जोड़कर देखा जाता है।
उत्तर प्रदेश में दशकों तक दलित राजनीति का केंद्र बहुजन समाज पार्टी रही है, जिसका झंडा भी नीले रंग का है। हालांकि, साल 2012 के बाद से BSP राजनीतिक तौर पर हाशिए पर है। 2007 में BSP ने 206 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया था और मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनी थीं। उस समय पार्टी का वोट शेयर 30.4 प्रतिशत था। लेकिन 2012 में 80, 2017 में 19 और 2022 में सिर्फ एक सीट पर सिमट गई, जबकि वोट शेयर घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया।
उत्तर प्रदेश में दलित, राजनीतिक तौर पर मजबूत स्थिति में हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य की आबादी में लगभग 23 प्रतिशत दलित हैं, जिनमें 12 से 13 प्रतिशत जाटव और 10 प्रतिशत पासी, वाल्मीकि, खटीक और गोंड जैसी छोटी दलित बिरादरियां शामिल हैं। गैर-जाटव दलित वर्ग का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी की ओर शिफ्ट हुआ है। बहुजन समाज पार्टी का जनाधार कमजोर होने के बाद, अखिलेश यादव ‘पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक’ (PDA) की राजनीति पर जोर दे रहे हैं। नीले रंग के जरिए वे यह राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि समाजवादी पार्टी अब दलित राजनीति के लिए अपने दरवाजे खोल रही है। ओम प्रकाश राजभर भी राजभर समुदाय (4% आबादी) की राजनीति करते हुए सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी का दायरा बढ़ाना चाहते हैं और 23 फीसदी दलित आबादी में अपने प्रतिनिधित्व पर जोर दे रहे हैं।







