Bihar MLC Election: बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों पर 23 अक्टूबर को मतदान होने वाला है। इस चुनाव में आम जनता सीधे तौर पर सभी उम्मीदवारों को वोट नहीं डालती, बल्कि अलग-अलग श्रेणियों के मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। यह बात विधायक और विधान पार्षद के बीच के सबसे बड़े अंतरों में से एक है। राज्य की राजनीति में इन दोनों पदों का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन उनके चुनाव का तरीका, कार्यकाल और अधिकार क्षेत्र बिल्कुल अलग होते हैं।
विधायक और विधान पार्षद: कौन किस सदन का सदस्य?
विधायक यानी मेंबर ऑफ लेजिस्लेटिव असेंबली (MLA) राज्य की विधानसभा का सदस्य होता है। वहीं, विधान पार्षद यानी मेंबर ऑफ लेजिस्लेटिव काउंसिल (MLC) राज्य की विधान परिषद का सदस्य होता है। विधानसभा को निचला सदन कहा जाता है, जबकि विधान परिषद ऊपरी सदन है। देश के हर राज्य में विधानसभा मौजूद है, लेकिन विधान परिषद सिर्फ छह राज्यों में ही है। इनमें बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना शामिल हैं।
कौन डालता है MLA और MLC के लिए वोट?
विधायक का चुनाव सीधे जनता द्वारा होता है। 18 साल या उससे अधिक उम्र का कोई भी भारतीय नागरिक, जिसका नाम संबंधित मतदाता सूची में दर्ज है, वह इस चुनाव में वोट दे सकता है। विधायक का चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम उम्र 25 साल निर्धारित है।
दूसरी ओर, विधान परिषद के सदस्यों के चुनाव की प्रक्रिया पूरी तरह अलग है। इसके लिए स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि, स्नातक मतदाता, शिक्षक मतदाता और विधायक ही वोट डालते हैं। इसके अतिरिक्त, विधान परिषद के कुछ सदस्यों को राज्यपाल नामित करते हैं। संविधान के अनुसार, विधान परिषद के लगभग एक-तिहाई सदस्य विधायकों द्वारा चुने जाते हैं। वहीं, लगभग एक-तिहाई सदस्यों का चुनाव स्थानीय निकायों के मतदाता करते हैं। स्नातक और शिक्षक वर्ग के मतदाता लगभग एक-बारहवां हिस्सा चुनते हैं, जबकि शेष सदस्यों को राज्यपाल नामित करते हैं। MLC का चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार की उम्र कम से कम 30 साल होनी चाहिए।
कार्यकाल और सदन की प्रकृति में अंतर
विधानसभा का सामान्य कार्यकाल पांच साल का होता है। हालांकि, इसे इस अवधि से पहले भी भंग किया जा सकता है। विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने पर नए चुनाव कराए जाते हैं।
इसके विपरीत, विधान परिषद एक स्थायी सदन है और इसे भंग नहीं किया जा सकता। इसके लगभग एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं और उनकी जगह नए सदस्य चुने जाते हैं। एक विधान पार्षद (MLC) का कार्यकाल पांच साल नहीं, बल्कि छह साल का होता है। यदि किसी खाली सीट पर उपचुनाव होता है, तो नए सदस्य का कार्यकाल उसके पूर्व सदस्य के बचे हुए समय के अनुसार हो सकता है।
अधिकारों और वित्तीय मामलों में कौन ताकतवर?
विधायक और विधान पार्षद दोनों के वेतन-भत्ते राज्य के नियमों के मुताबिक तय होते हैं। हालांकि, दोनों सदनों के सदस्यों की विधायी ताकत एक जैसी नहीं होती। विधानसभा को राज्य के वित्तीय मामलों और सरकार की जवाबदेही तय करने में अधिक अधिकार प्राप्त हैं। विधान परिषद कानूनों पर चर्चा कर सकती है और विधेयकों में बदलाव के सुझाव भी दे सकती है, लेकिन कुछ मामलों में उसका निर्णय अंतिम नहीं होता।
राज्य का धन विधेयक केवल विधानसभा में ही पेश किया जा सकता है। विधान परिषद इसे न तो खारिज कर सकती है और न ही अपने स्तर पर इसमें बदलाव लागू कर सकती है। विधान परिषद धन विधेयक पर सुझाव देकर उसे अधिकतम 14 दिनों के भीतर विधानसभा को वापस भेज सकती है। विधानसभा उन सुझावों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। यदि 14 दिनों में विधेयक वापस नहीं आता है, तो उसे दोनों सदनों से पारित माना जाता है।
राज्य की सरकार विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है। विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है और यदि यह प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद को अपना पद छोड़ना पड़ता है। विधान परिषद में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए सरकार को हटाने का अधिकार नहीं है। विधान पार्षद सवाल पूछकर, बहस में हिस्सा लेकर और सरकार के कामकाज पर चर्चा करके अपनी बात रख सकते हैं।
राष्ट्रपति और राज्यसभा चुनाव में कौन करता है मतदान?
राष्ट्रपति चुनाव में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य और राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक वोट डालते हैं। विधान परिषद के सदस्य इस चुनाव में मतदान नहीं करते हैं। राज्यसभा चुनाव में भी राज्यों के निर्वाचित विधायक ही वोट देते हैं। विधान पार्षद को राज्यसभा के सदस्यों के चुनाव में मतदान का अधिकार नहीं है। इस तरह, विधायक और MLC दोनों राज्य की राजनीति और कानून बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, लेकिन उनके चुनाव का तरीका, कार्यकाल और अधिकार स्पष्ट रूप से अलग-अलग हैं, जो बिहार जैसे राज्यों की लोकतांत्रिक संरचना को प्रभावित करते हैं।







