स्कूल की व्यवस्था वहां का माहौल पढ़ाई लायक कम दिखने लगा है। स्कूल परिसर में जमकर मारपीट, हंगामा की खबरें लगातार विचलित कर रही हैं। लड़कों का रवैया भी सामान्य पहले जैसा नहीं रहा। लड़कियां भी कम कसूरवार नहीं है मगर यह सब विमर्श का विषय है। फिलहाल स्कूल परिसर के बाहर उचक्के, शहर के लिए अब नई बात नहीं रहे। छुट्टी का समय होते ही वहां के तमाम छुटभैये दुकानदार, स्कूल गेट के बाहर उस भीड़ से अमूमन पट जा रहे हैं जिसकी शक्ल में ही उचक्कापन है। वह लड़कियों के लिए परेशानी का सबब तो बन ही रहे अभिभावकों के लिए काफी निराशाजनक व चिंताग्रस्त स्थिति में घोर विस्मय परिस्थिति छोड़ रहे हैं। पुलिस को पता है। प्रशासन को जानकारी है। मगर दुखद यही कि ऐसे उचक्कों की पूरी सत्ता इन अफसरों पर भारी है। यही वजह है एक कविता याद आती है जो इस शहर को नसीब नहीं, उनमें आदमियों का नहीं, एक जंगल का बचपन है, जंगल जो हरियाली से काट दिए गए हैं, और अब सिर्फ आग ही हो सकते हैं। हालात यही है, ऐसा हंगामा न था जंगल में शहर में आए तो डर लगता था, ए मेरे दोस्त… मुझको कहानियां न सुना शहर को बचा 
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ऐसा हंगामा न था जंगल में ए मेरे दोस्त… मुझको कहानियां न सुना शहर को बचा
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