Bihar Encounter: “जो आवाज़ हक़ की बात करती है, वह अक्सर सत्ता के कानों में शोर लगती है। मगर जब वह आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो जाए, तब सवाल सिर्फ मौत का नहीं, इंसाफ का भी होता है…” भोजपुर में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर की गूंज अब गांव की गलियों से निकलकर पूरे बिहार में सुनाई दे रही है। पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं। परिवार इसे फर्जी एनकाउंटर बता रहा है, जबकि जवनिया गांव के विस्थापित लोग भरत को अपना रहनुमा और संघर्ष का चेहरा मान रहे हैं।
एनकाउंटर के कई दिन बाद अब भरत तिवारी की बहन, पिता और ग्रामीण खुलकर सामने आए हैं। उनके आरोप गंभीर हैं—करीब से गोली मारने से लेकर अस्पताल में शव के साथ अमानवीय व्यवहार तक। दूसरी ओर, गांव के लोग पूछ रहे हैं कि जो युवक उनके अधिकारों के लिए लड़ रहा था, वह आखिर पुलिस की गोली का निशाना कैसे बन गया?






एक नजर में पूरा मामला
| बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| नाम | भरत तिवारी |
| जिला | भोजपुर |
| गांव | जवनिया |
| विवाद | पुलिस एनकाउंटर |
| परिवार का आरोप | फर्जी एनकाउंटर |
| ग्रामीणों का दावा | सरेंडर के बाद गोली मारी गई |
| मुख्य मांग | निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच |
PMCH में भाई की तलाश और फिर सामने आई दर्दनाक सच्चाई
भरत तिवारी की बहन की आंखें उस दिन को याद कर अब भी भर आती हैं। बक्सर से पटना पहुंची बहन अस्पताल के गलियारों में अपने भाई को तलाशती रही। किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
बहन का दावा है कि बाद में एक डॉक्टर ने उन्हें बताया कि एनकाउंटर में मारे गए व्यक्ति का शव अस्पताल में लाया गया था।
“जब मैं वहां पहुंची तो देखा कि वह मेरे भाई भरत की बॉडी थी। पुलिस उसे अस्पताल में छोड़कर चली गई थी। किसी तरह की जांच नहीं हुई। किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह जिंदा था या नहीं।”
बहन का आरोप है कि भरत के शरीर पर कई गोलियों के निशान थे।
“भाई को पांच गोलियां लगी थीं। प्राइवेट पार्ट में भी उन्हें एक गोली लगी थी… एक गोली शरीर को चीरते हुए निकल गई थी। हमें लगता है कि बहुत करीब से फायरिंग की गई थी। उन्हें धोखा दिया गया…”
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है।
“पुलिस ने भरोसा दिलाया, फिर धोखा दिया”
भरत की बहन का कहना है कि उनका भाई किसी निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि गांव के लोगों के हक की लड़ाई लड़ रहा था।
“18 साल की उम्र से वह जवनिया गांव के लोगों की समस्याओं के लिए संघर्ष कर रहा था। उसकी जिद थी कि विस्थापित परिवारों को न्याय मिलना चाहिए।”
परिवार का आरोप है कि भरत को लगातार मानसिक दबाव में रखा गया और अंततः उसकी जिंदगी खत्म हो गई।
पिता की पीड़ा: बेटा मर गया, लेकिन मुझे खबर तक नहीं दी गई
भरत तिवारी के पिता काशीनाथ, जो बिहार पुलिस से हवलदार पद से रिटायर हुए हैं, अपने बेटे की मौत का जिक्र करते हुए भावुक हो जाते हैं।
उनका कहना है कि घटना वाले दिन वह खुद थाने पहुंचे थे।
“मैं पुलिस को बताने गया था कि मेरा बेटा मानसिक तनाव में है। लेकिन मुझे सुबह से शाम तक थाने में बैठाकर रखा गया।”
काशीनाथ के मुताबिक, पुलिसकर्मी उन्हें बार-बार यही कहते रहे कि भरत को मामूली चोट लगी है और वह ठीक हो जाएगा।
“किसी ने नहीं बताया कि उसका एनकाउंटर हो चुका है।”
12 घंटे तक थाने में बैठे रहे, बेटे का आखिरी चेहरा भी नहीं देख सके
काशीनाथ का सबसे बड़ा दर्द यही है कि वे अपने बेटे के अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाए।
“मेरे बेटे की मौत हो चुकी थी, लेकिन मुझे 12 घंटे तक थाने में बैठाए रखा गया। अगर समय पर बताया जाता तो कम से कम मैं उसे आखिरी बार देख लेता।”
उनका आरोप है कि पुलिस ने उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया।
ग्रामीणों का दावा: भरत ने हथियार छोड़ दिए थे
जवनिया गांव में आज भी लोग इस घटना को लेकर गुस्से और दुख से भरे हुए हैं।
ग्रामीणों का दावा है कि भरत ने कथित रूप से हथियार फेंककर आत्मसमर्पण कर दिया था।
“अगर कोई व्यक्ति सरेंडर कर चुका था तो फिर गोलियां क्यों चलीं? यही सवाल पूरा गांव पूछ रहा है।”
हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
“हमारे लिए भगवान जैसा था भरत”
गांव के विस्थापित परिवार भरत तिवारी को सिर्फ एक युवक नहीं, बल्कि उम्मीद की आखिरी किरण मानते थे।
“हमारे घर गंगा में बह गए थे। हमारी बात सुनने वाला कोई नहीं था। भरत ही हमारे लिए खड़ा हुआ था।”
योगेंद्र चौधरी की आवाज में भी दर्द साफ झलकता है।
“वह बच्चों की पढ़ाई, सड़क, बिजली और पानी की चिंता करता था। हमेशा कहता था कि गांव को उसका हक मिलना चाहिए।”
क्यों लड़ रहे थे भरत तिवारी?
भरत तिवारी पिछले साल गंगा कटाव से प्रभावित जवनिया गांव के करीब 70 विस्थापित परिवारों की लड़ाई लड़ रहे थे।
सरकार की ओर से इन परिवारों को दूसरी जगह जमीन और आर्थिक सहायता दी गई थी। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि जहां बसाया गया, वहां बुनियादी सुविधाएं ही नहीं थीं।
ग्रामीणों की प्रमुख शिकायतें
- रहने योग्य जमीन नहीं
- बारिश में घुटने भर पानी
- पक्की सड़क का अभाव
- स्कूल की व्यवस्था नहीं
- पीने के साफ पानी की समस्या
- बिजली और अन्य मूलभूत सुविधाओं की कमी
भरत इन्हीं मुद्दों को लेकर अधिकारियों और प्रशासन के सामने लगातार आवाज उठा रहे थे।
विस्थापितों की लड़ाई का चेहरा बन चुके थे भरत
ग्रामीणों के मुताबिक, भरत प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर लगाते थे, अधिकारियों से मिलते थे और विस्थापित परिवारों की समस्याओं को सोशल मीडिया से लेकर जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाते थे।
यही वजह थी कि धीरे-धीरे वह गांव की लड़ाई का सबसे मजबूत चेहरा बन गए।
“भरत हमारे लिए भगत सिंह जैसा था। जो जनता के लिए आवाज उठाएगा, उसे पागल कह देना आसान है।”
भरत के जाने के बाद परिवार पर आर्थिक संकट
| परिवार की स्थिति | विवरण |
|---|---|
| पिता | रिटायर्ड हवलदार |
| आय का स्रोत | पेंशन |
| भरत की योजना | ई-बाइक शोरूम खोलना |
| वर्तमान स्थिति | आर्थिक संकट |
परिजनों का कहना है कि भरत भविष्य में अपना कारोबार शुरू करना चाहते थे, लेकिन उनकी मौत के बाद पूरा परिवार आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रहा है।
गांव में अब भी गूंज रहा एक सवाल
भरत तिवारी की मौत अब सिर्फ एक एनकाउंटर की कहानी नहीं रह गई है। यह उन सवालों का प्रतीक बन चुकी है, जिनके जवाब जवनिया गांव तलाश रहा है।
परिवार फर्जी एनकाउंटर का आरोप लगा रहा है। ग्रामीण इसे अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले युवक की हत्या बता रहे हैं। वहीं, पूरे मामले में निष्पक्ष जांच की मांग लगातार तेज होती जा रही है।
परिवार और ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
- पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच
- एनकाउंटर की स्वतंत्र पड़ताल
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए
- जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो
- परिवार को न्याय और सुरक्षा मिले
आखिर में गांव के लोगों की जुबान पर सिर्फ एक सवाल है—
“अगर भरत गलत था तो सबूत सामने लाइए, और अगर सही था तो उसे न्याय दिलाइए।”








