Bihar Politics: बिहार विधानमंडल के मानसून सत्र का अंतिम दिन राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के लिए एक बड़े राजनीतिक झटके के साथ समाप्त हुआ। पार्टी के पूर्व प्रदेश प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी शुक्रवार को भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए। इस घटनाक्रम को बिहार की सियासत में एक महत्वपूर्ण मोड़ के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से ठीक पहले।
पटना स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित मिलन समारोह में मृत्युंजय तिवारी ने भगवा दल की सदस्यता ग्रहण की। इस मौके पर पूर्व मंत्री मंगल पांडेय सहित कई वरिष्ठ भाजपा नेता मौजूद रहे। तिवारी का भाजपा में जाना तेजस्वी यादव की गैरहाजिरी के बीच राजद के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।






20 साल बाद क्यों छोड़ा राजद का साथ?
मृत्युंजय तिवारी ने राजद छोड़ने के अपने फैसले के पीछे पार्टी के भीतर उपेक्षा को मुख्य वजह बताया। उन्होंने कहा कि वह पिछले कई महीनों से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने अपनी बात रख रहे थे। हालांकि, उनकी शिकायतों और सुझावों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया, जिससे उन्हें गहरा दुख हुआ।

मृत्युंजय तिवारी ने कहा, ‘करीब 20 वर्षों तक मैंने राजद के लिए पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ काम किया, लेकिन बदले में मुझे लगातार उपेक्षा का सामना करना पड़ा। पार्टी में कार्यकर्ताओं की बात सुनने की परंपरा कमजोर होती जा रही है और उनकी पीड़ा को गंभीरता से नहीं लिया गया।’
उनकी यह टिप्पणी राजद के आंतरिक कामकाज और कार्यकर्ताओं के प्रति पार्टी के रवैये पर गंभीर सवाल उठाती है। 20 साल तक एक ही दल में रहने के बाद यह कदम उठाना पार्टी के लिए चिंता का विषय है।
तेजस्वी की गैरहाजिरी और सियासी तापमान
मृत्युंजय तिवारी ने 16 जुलाई को ही राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। उस समय प्रदेश अध्यक्ष ने उनसे तेजस्वी यादव के लौटने तक इंतजार करने का आग्रह भी किया था। लेकिन, तिवारी ने यह इंतजार खत्म कर भाजपा का दामन थाम लिया। तेजस्वी यादव की सदन से गैरहाजिरी पर पहले ही सियासी गलियारों में बहस छिड़ी हुई है और अब इस बड़े दलबदल ने राजद पर दबाव और बढ़ा दिया है। बांकीपुर उपचुनाव से पहले यह घटनाक्रम राजद की रणनीति और भविष्य पर गहरा असर डाल सकता है।
राजद के लिए पूरी निष्ठा और समर्पण के बाद, ऐसा क्या हुआ?
मृत्युंजय तिवारी ने भाजपा में शामिल होने के बाद अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने बताया कि वह पिछले कई महीनों से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने अपनी बातें रख रहे थे, लेकिन उनकी शिकायतों और सुझावों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। तिवारी ने कहा कि उन्होंने करीब 20 वर्षों तक राजद के लिए पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ काम किया, लेकिन बदले में उन्हें लगातार उपेक्षा का सामना करना पड़ा।
पार्टी में कार्यकर्ताओं की बात सुनने की परंपरा कमजोर होती जा रही है और उनकी पीड़ा को गंभीरता से नहीं लिया गया। इसी कारण उन्होंने राजद छोड़ने का फैसला किया।
यह बयान राजद के अंदरूनी कलह और कार्यकर्ताओं की अनदेखी के आरोपों को बल देता है।
इंतजार करने का आग्रह नहीं आया काम
मृत्युंजय तिवारी के दल-बदल की यह घटना ऐसे समय में हुई है, जब राजद नेता तेजस्वी यादव सदन से अनुपस्थित चल रहे हैं। उनकी गैरमौजूदगी में ही पार्टी के एक वरिष्ठ और पुराने नेता का भाजपा में शामिल होना विपक्ष को राजद पर हमलावर होने का नया मौका दे सकता है। 16 जुलाई को ही मृत्युंजय तिवारी ने राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल को अपना इस्तीफा सौंपा था। हालांकि, उस समय मंगनी लाल मंडल ने उनसे तेजस्वी यादव के लौटने तक इंतजार करने का आग्रह किया था।
बांकीपुर उपचुनाव से पहले RJD को चुनौती
मृत्युंजय तिवारी का भाजपा में शामिल होना आगामी बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से पहले राजद के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। एक अनुभवी नेता का पार्टी छोड़ना न केवल कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित करेगा, बल्कि भाजपा को इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर भी प्रदान करेगा। राजद को अब अपनी आंतरिक कलह और शीर्ष नेतृत्व की अनुपस्थिति जैसे सवालों का सामना करना पड़ सकता है, जो आगामी चुनाव में उसके प्रदर्शन पर असर डाल सकता है।









