Bihar Farakka Agreement: भारत और बांग्लादेश के बीच हुए फरक्का गंगा जल समझौते को लेकर बिहार ने एक महत्वपूर्ण मांग उठाई है। जेडीयू नेता और राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि 2026 में समाप्त हो रहे इस समझौते को पुराने ढर्रे पर आगे न बढ़ाया जाए। उन्होंने जोर दिया कि बिहार की वर्तमान और भविष्य की पानी की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक नई व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
संजय झा ने केंद्र से मांग की है कि फरक्का जल समझौते की अवधि खत्म होने के बाद बिहार के हितों को प्राथमिकता दी जाए। उनका कहना है कि तीन दशक पहले बिहार में जो पानी की स्थिति थी, वह आज पूरी तरह बदल चुकी है।

बिहार में बढ़ रही पानी की किल्लत, भूजल स्तर लगातार गिर रहा
बिहार के कई इलाकों में भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है, जिससे चिंता बढ़ गई है। खेती, पीने के पानी और अन्य दैनिक जरूरतों के लिए गंगा नदी पर राज्य की निर्भरता काफी बढ़ गई है। इस बदलते परिदृश्य को देखते हुए, संजय झा ने कहा है कि आने वाले समय में बिहार को कितनी पानी की जरूरत होगी, इसका नए सिरे से वैज्ञानिक आकलन करना बेहद जरूरी है।
संजय झा ने राज्यसभा में स्पष्ट किया, ‘बिहार समेत गंगा पर निर्भर राज्यों की साल 2050 तक की पानी की जरूरत का वैज्ञानिक तरीके से आकलन होना चाहिए।’
बिहार सरकार के अनुमानों के मुताबिक, राज्य को भविष्य में लगभग 2000 क्यूसेक अतिरिक्त पानी की आवश्यकता पड़ सकती है। यह आंकड़ा राज्य की बढ़ती आबादी और विकास की जरूरतों को दर्शाता है।
12 दिसंबर 2026 के बाद क्या बदलेगा?
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे का समझौता 12 दिसंबर 1996 को हुआ था। यह समझौता 30 साल की अवधि के लिए था, जिसका अर्थ है कि इसकी वर्तमान अवधि 12 दिसंबर 2026 को पूरी हो जाएगी। इस समझौते के तहत, फरक्का बैराज के पास गंगा के पानी को भारत और बांग्लादेश के बीच बांटा जाता है। हर साल 1 जनवरी से 31 मई तक, कम पानी वाले समय में, एक तय नियम के आधार पर जल का बंटवारा होता है। इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी दोनों देशों की एक संयुक्त समिति करती है। समझौते में यह भी प्रावधान है कि दोनों देश सहमत हों तो इसे आगे बढ़ाया जा सकता है।
यही कारण है कि बिहार के लिए यह सवाल अब अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि भविष्य की व्यवस्था तय करते समय राज्य की बढ़ती पानी की जरूरत को कितना महत्व दिया जाएगा।
फरक्का करार और बिहार का सीधा संबंध
फरक्का समझौता सीधे तौर पर बिहार को पानी देने या उसके लिए पानी की मात्रा तय करने वाला करार नहीं है। यह मुख्य रूप से भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का बैराज पर गंगा के पानी के बंटवारे की व्यवस्था से संबंधित है। हालांकि, गंगा के पानी का उपयोग और उसका बहाव बिहार की पानी की जरूरतों से सीधे जुड़ा हुआ है। इसी वजह से बिहार में यह मुद्दा सिर्फ भारत-बांग्लादेश संबंधों का मामला नहीं माना जाता, बल्कि इसका सीधा असर राज्य की खेती, पीने के पानी, भूजल स्तर और लंबी अवधि की जल सुरक्षा पर भी पड़ता है।
बाढ़ और पानी की कमी की दोहरी चुनौती
बिहार की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह राज्य एक साथ बाढ़ और पानी की कमी दोनों का सामना करता है। जहां उत्तर बिहार में हर साल गंगा और उसकी सहायक नदियों के कारण कई इलाकों में भीषण बाढ़ आती है, वहीं दक्षिण बिहार के कई क्षेत्रों में गर्मी के मौसम में भूजल स्तर बहुत नीचे चला जाता है। इससे पीने और सिंचाई के पानी की समस्या गंभीर हो जाती है। ऐसे में बिहार के सामने केवल अधिक पानी प्राप्त करने की चुनौती नहीं है, बल्कि बाढ़ के दौरान उपलब्ध अतिरिक्त पानी को बचाकर रखने और जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग करने की भी बड़ी चुनौती है।
पानी की मांग में अंतर और नए अध्ययन की आवश्यकता
संजय झा ने बिहार सरकार के आकलन के आधार पर लगभग 2000 क्यूसेक अतिरिक्त पानी की जरूरत बताई है। हालांकि, 2026 में सामने आई एक अंदरूनी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, फरक्का समझौते की समीक्षा के लिए बनी समिति ने कम पानी वाले मौसम में बिहार की पीने के पानी और उद्योगों की जरूरतों के लिए 900 क्यूसेक पानी की सिफारिश की थी। इन दोनों आंकड़ों के बीच काफी अंतर है, जो यह दर्शाता है कि बिहार के लिए वास्तव में कितनी पानी की जरूरत होगी, इसे लेकर एक नए और व्यापक अध्ययन की तत्काल आवश्यकता है।
बदलती जरूरतें, बदलता आकलन
संजय झा की मांग का सबसे अहम बिंदु साल 2050 तक बिहार की पानी की जरूरतों का आकलन है। उनका तर्क है कि केवल 1996 के पुराने आंकड़ों के आधार पर आने वाले समय की जल व्यवस्था तय करना उचित नहीं होगा। बिहार में आबादी, खेती, उद्योग, शहरीकरण और पीने के पानी की जरूरतें लगातार बदल रही हैं। ऐसे में, बिहार को अगले 20 से 25 सालों में कितनी पानी की आवश्यकता होगी, इसका पहले से आकलन करके उसी के आधार पर भविष्य की जल नीति और समझौते तय करने की मांग की जा रही है।






