Bihar Politics: दिल्ली की सड़कों पर ऑटो रिक्शा की पिछली सीट पर बैठे बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की एक तस्वीर ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। सफेद कुर्ता पहने राजद नेता का यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। आमतौर पर सुरक्षा घेरे और गाड़ियों के काफिले में नजर आने वाले तेजस्वी इस बार ऑटो से सफर करते दिखे। इस तस्वीर को देखकर लोग उनके पिता और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के उस दौर को याद कर रहे हैं, जब लालू रिक्शे पर सवार होकर विधानसभा पहुंचते थे और अपने खास अंदाज से सियासी संदेश देते थे।
बिहार में एक प्रसिद्ध कहावत है, ‘बापे पूत परापत घोड़ा, कुछ नहीं तो थोड़े थोड़ा।’ यानी बेटा अपने पिता के जैसा पूरी तरह न सही, लेकिन कुछ न कुछ समानता जरूर दिखाता है। तेजस्वी की इस ऑटो सवारी को इसी कहावत से जोड़कर देखा जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह महज दिल्ली में सफर का एक सामान्य तरीका था या इसके पीछे कोई गहरा सियासी संदेश छिपा है? इस तस्वीर ने Bihar Politics में पिता-पुत्र की राजनीतिक शैली पर नई बहस छेड़ दी है।
दिल्ली में ऑटो की सवारी, काफिला क्यों छूटा पीछे?
तेजस्वी यादव का जो वीडियो सामने आया है, उसमें वे दिल्ली में ऑटो रिक्शा की पिछली सीट पर बैठे नजर आ रहे हैं। उनके साथ सुरक्षाकर्मी भी मौजूद थे। वीडियो में पीछे से आवाज देने पर तेजस्वी मुस्कुराते भी दिखते हैं। उन्होंने खुद यह वीडियो अपने सोशल मीडिया हैंडल पर साझा किया है, जिससे यह और अधिक चर्चा में आ गया।
तेजस्वी की पहचान बिहार के एक बड़े राजनीतिक परिवार से है। उनके काफिले में आमतौर पर एस्कॉर्ट गाड़ियां और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रहती है। ऐसे में ऑटो की पिछली सीट पर उनका इस तरह बैठना लोगों का ध्यान खींच रहा है। यह तस्वीर ऐसे समय सामने आई है, जब तेजस्वी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के आंदोलन में शामिल हुए। वे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ एसआईआर के विरोध में भी नजर आए थे।
हालांकि, सिर्फ वीडियो के आधार पर यह साबित नहीं होता कि ऑटो की सवारी के पीछे कोई खास राजनीतिक रणनीति थी। यह सामान्य सफर भी हो सकता है। लेकिन बिहार की राजनीति में लालू यादव की पुरानी तस्वीरों और उनके राजनीतिक अंदाज के कारण तेजस्वी की यह सवारी एक अलग चर्चा का विषय बन गई है।
जब लालू रिक्शे से पहुंचते थे विधानसभा
लालू प्रसाद यादव की राजनीति का एक खास पहलू उनका आम लोगों के बीच सहज और सरल अंदाज रहा है। रिक्शे पर बैठना, साधारण लोगों के साथ घुलना-मिलना और अपनी ठेठ भाषा में उनसे संवाद करना उनकी सार्वजनिक छवि का अभिन्न हिस्सा बना। पुराने दौर में लालू यादव की रिक्शे पर सवारी की तस्वीरें अखबारों में प्रमुखता से छपती थीं।
लालू की राजनीति उस समय आगे बढ़ रही थी, जब बिहार में सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों की भागीदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे बेहद अहम थे। उन्होंने अपनी छवि एक ऐसे नेता की बनाई, जो सत्ता के पारंपरिक तौर-तरीकों से अलग दिखता था। रिक्शे पर सवार होकर विधानसभा पहुंचने जैसे दृश्य इसी छवि को मजबूत करते थे कि वे आम आदमी के नेता हैं।
लालू यादव का राजनीतिक संदेश सिर्फ उनके भाषणों से नहीं बनता था। उनका पहनावा, बोलने का तरीका और आम लोगों के बीच मौजूदगी भी उनकी राजनीति का हिस्सा थे। वह खुद को गरीब परिवार से आया नेता बताते थे। ऐसे में रिक्शे पर दिखना आम आदमी से जुड़ाव का प्रतीक बन जाता था।
यही वजह है कि जब तेजस्वी ऑटो रिक्शा पर नजर आए, तो लोगों को लालू यादव की पुरानी तस्वीरें अनायास याद आने लगीं। दोनों तस्वीरों के समय और परिस्थितियां भले ही अलग हों, लेकिन इनके बीच एक समानता जरूर दिखाई देती है- सड़क पर आम सवारी और उसके जरिए बनने वाली राजनीतिक चर्चा।
लालू का संघर्ष और राजनीति का शिखर
लालू प्रसाद यादव का जन्म 11 जून 1948 को बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में हुआ था। उनका बचपन आर्थिक कठिनाइयों के बीच बीता। अपनी आत्मकथा ‘गोपालगंज टू रायसीना’ में उन्होंने शुरुआती जीवन के संघर्षों का जिक्र किया है। गांव में मवेशी चराने से लेकर पटना में पढ़ाई करने तक का उनका सफर आसान नहीं था।
लालू पढ़ाई के लिए पटना आए। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय के बीएन कॉलेज से पढ़ाई की और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। बाद में वह बिहार पशु चिकित्सा महाविद्यालय में क्लर्क के रूप में भी काम करने लगे, जहां उनके बड़े भाई चपरासी थे।
लेकिन लालू की असली पहचान छात्र राजनीति से बनी। वह पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव बने और 1973 में अध्यक्ष चुने गए। इसी दौर में बिहार की राजनीति में उनकी सक्रियता बढ़ी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुए आंदोलन ने उन्हें व्यापक राजनीतिक मंच दिया। आपातकाल के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा था।
1977 में जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतकर लालू यादव महज 29 साल की उम्र में सांसद बने। इसके बाद उन्होंने बिहार की राजनीति में लगातार अपनी जगह मजबूत की। मार्च 1990 में वह पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। उनकी राजनीति में सामाजिक न्याय और गरीबों-पिछड़ों की भागीदारी प्रमुख मुद्दे रहे। मुख्यमंत्री रहते हुए ताड़ी की बिक्री पर लगने वाले कर और उपकर को हटाने, चरवाहा विद्यालय खोलने और खेतिहर मजदूरों के न्यूनतम पारिश्रमिक में बढ़ोतरी जैसे फैसलों को भी इसी राजनीतिक संदर्भ में याद किया जाता है। लालू की सार्वजनिक छवि में रिक्शा सिर्फ एक वाहन नहीं था, वह उस राजनीतिक शैली का हिस्सा था, जिसमें नेता खुद को आम लोगों के करीब दिखाता था।
सियासी विरासत: पिता-पुत्र की यात्रा में समानताएं और अंतर
लालू यादव और तेजस्वी यादव की तस्वीरों को जोड़ने वाली बात यही है कि दोनों की सार्वजनिक पहचान आम लोगों से जुड़ाव के दावे के साथ सामने आती रही है। लालू ने अपने दौर में रिक्शे की सवारी और आम लोगों के बीच अपनी मौजूदगी से एक अलग राजनीतिक छवि बनाई। तेजस्वी की ऑटो सवारी ने उसी छवि की याद दिला दी है।
हालांकि, दोनों दौर की राजनीति में अंतर स्पष्ट है। लालू यादव ने छात्र आंदोलन, सामाजिक न्याय की राजनीति और बिहार के बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच अपनी पहचान बनाई थी। तेजस्वी यादव को एक स्थापित राजनीतिक दल, पिता की विरासत और पहले से मौजूद राजनीतिक आधार मिला है। वह राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख नेताओं में हैं और बिहार में विपक्ष की राजनीति का नेतृत्व करते हैं।
इसलिए केवल ऑटो में बैठने की तस्वीर के आधार पर दोनों की राजनीति को एक जैसा नहीं कहा जा सकता। लालू की राजनीतिक पहचान कई वर्षों के संघर्ष, संगठन और चुनावी सफलताओं से बनी थी। तेजस्वी की राजनीतिक यात्रा का मूल्यांकन भी उनके फैसलों, मुद्दों, जनसंपर्क और राजनीतिक कामकाज से ही होगा। फिर भी, राजनीति में प्रतीकों की अपनी अहमियत होती है। कोई नेता किस तरह सफर करता है, किसके बीच दिखाई देता है और आम लोगों से कैसे संवाद करता है, ये बातें उसकी सार्वजनिक छवि को प्रभावित कर सकती हैं। तेजस्वी की ऑटो सवारी भी इसी वजह से चर्चा में है।
ऑटो की सवारी से बड़ा है राजनीतिक संदेश
तेजस्वी यादव की दिल्ली में ऑटो सवारी को लालू यादव की पुरानी रिक्शा यात्राओं से जोड़कर देखना दिलचस्प है। इससे पिता-पुत्र के बीच एक प्रतीकात्मक समानता जरूर नजर आती है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि तेजस्वी ने यह सफर किसी खास राजनीतिक संदेश के लिए किया था।
लालू यादव ने रिक्शे और आम लोगों के बीच अपनी मौजूदगी को अपनी राजनीतिक छवि का हिस्सा बनाया था। तेजस्वी की तस्वीर ने उस दौर की याद जरूर ताजा की है। आगे यह देखना होगा कि तेजस्वी आम लोगों के मुद्दों को अपनी राजनीति में किस तरह जगह देते हैं और क्या यह केवल एक तस्वीर तक सीमित रहता है या उनकी राजनीतिक शैली का हिस्सा बनता है।
फिलहाल, दिल्ली की सड़क पर ऑटो की पिछली सीट पर बैठे तेजस्वी की तस्वीर ने बिहार की एक पुरानी कहावत को फिर चर्चा में ला दिया है- ‘बापे पूत परापत घोड़ा, कुछ नहीं तो थोड़े थोड़ा।’








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