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चर्चा नई है: NDA बचाने वाली नीलम देवी को JDU ने ही दिखाया बाहर का रास्ता | कहां घुस गए कॉक्रोच | अनंत सिंह पर तलवार के 4 प्वाइंट !

Bihar JDU: फरवरी 2024 में नीतीश सरकार के फ्लोर टेस्ट में क्रॉस वोटिंग करने वालीं मोकामा की विधायक नीलम देवी और उनके पति अनंत सिंह पर जनता दल यूनाइटेड ने बड़ी कार्रवाई की है। पार्टी ने दोनों को 6 साल के लिए बाहर का रास्ता दिखाया है, साथ ही अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता रद्द करने की सिफारिश भी की है।

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Bihar JDU: बिहार की सियासत में एक बार फिर अनंत सिंह और उनकी पत्नी बिहार की विधायक नीलम देवी चर्चा में हैं। जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने इन दोनों नेताओं पर बड़ी कार्रवाई करते हुए उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है। इसके साथ ही, पार्टी ने अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता रद्द करने की सिफारिश भी की है, जिससे उनकी राजनीतिक यात्रा पर नया संकट मंडरा रहा है। यह कार्रवाई फरवरी 2024 में नीतीश कुमार सरकार के फ्लोर टेस्ट के दौरान नीलम देवी द्वारा की गई क्रॉस वोटिंग और पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोपों के बाद हुई है।

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सवाल उठ रहा, क्या अनंत सिंह नई पार्टी बनाएंगे। आखिर, ललन सिंह और नीतीश कुमार के बीच क्या बात हुई। जिंदाबाद के नारे क्यों लगे।

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अनंत सिंह के समर्थन में उतरे JDU के पूर्व MLC वाल्मीकि सिंह कहा पार्टी में घुस गए हैं कॉकरोच..!

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JDU ने क्यों लिया यह कड़ा फैसला?

JDU के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने शनिवार शाम यह निष्कासन आदेश जारी किया। पार्टी ने अनंत सिंह और नीलम देवी दोनों पर अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का गंभीर आरोप लगाया है। पार्टी के अनुसार, अनंत सिंह ने बिहार विधान परिषद चुनाव में JDU के उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ प्रचार किया था। उन पर जन सुराज के प्रत्याशी का समर्थन करने का भी आरोप है।

पार्टी ने अनंत सिंह पर JDU के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने का भी आरोप लगाया है। वहीं, नीलम देवी को दलविरोधी गतिविधियों में शामिल रहने के आरोप में निष्कासित किया गया है।

फरवरी 2024 का फ्लोर टेस्ट और नीलम देवी का अहम रोल

फरवरी 2024 में बिहार की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला था, जब नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग होकर NDA में लौट आए थे। नई सरकार बनने के बाद 12 फरवरी 2024 को विधानसभा में बहुमत साबित करना था। फ्लोर टेस्ट से ठीक पहले, RJD के तीन विधायक विपक्ष का साथ छोड़कर सत्ता पक्ष के खेमे में आ गए थे। इनमें मोकामा की तत्कालीन विधायक नीलम देवी भी शामिल थीं। उन्होंने चेतन आनंद और प्रह्लाद यादव के साथ मिलकर NDA सरकार के समर्थन में मतदान किया था।

इन विधायकों की क्रॉस वोटिंग ने नीतीश सरकार को बहुमत साबित करने में महत्वपूर्ण मदद की, जिससे सरकार पर मंडरा रहा संकट टल गया। नीलम देवी का यह फैसला उस समय काफी चर्चा में रहा था। वह 2022 में RJD के टिकट पर मोकामा से उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंची थीं।

JDU से निष्कासन के बाद अनंत सिंह के आवास के बाहर आतिशबाजी!

➡️ JDU से निकाले जाने के बाद अनंत सिंह के आवास पर पटाखे फोड़े जाने की खबर सामने आई है।

➡️ इस घटनाक्रम के बाद बिहार की सियासत में चर्चा तेज हो गई है।

➡️ पटाखे किसने और किस वजह से फोड़े, इसे लेकर आधिकारिक जानकारी सामने आना बाकी है। बिहार की राजनीति में इस घटनाक्रम के क्या मायने निकाले जाएंगे?

अनंत सिंह की विधायकी जाएगी या बचेगी? JDU से निकाले जाने के बाद अब क्या होगा, जानें पूरा खेल!

Bihar Anti-defection Law: मोकामा के विधायक अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता पर अब तलवार लटक गई है. जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने उन्हें पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है, साथ ही उनकी प्राथमिक सदस्यता भी रद्द कर दी गई है. JDU ने बिहार विधानसभा अध्यक्ष से अनंत सिंह की सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश की है. इस कार्रवाई के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी से निष्कासित होते ही किसी विधायक की विधायकी खत्म हो जाती है? इसका जवाब दल-बदल विरोधी कानून की जटिलताओं में छिपा है.

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पार्टी ने अनंत सिंह पर विधान परिषद चुनाव में अनुशासनहीनता का आरोप लगाया है. उन्होंने पार्टी उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ जाकर जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह का समर्थन किया था. हालांकि, पार्टी से निष्कासन और विधानसभा सदस्यता रद्द होने की प्रक्रिया अलग-अलग होती है, जिसमें संविधान के तय नियमों का पालन करना अनिवार्य है.

JDU ने अनंत सिंह पर क्यों की कार्रवाई?

JDU के अनुसार, अनंत सिंह ने पार्टी के निर्देशों की अवहेलना की है. पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में उन्होंने पार्टी उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ काम किया और जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह का खुलकर समर्थन किया. पार्टी ने इसे गंभीर अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधि माना है. इसी आधार पर उन पर यह बड़ी कार्रवाई की गई है.

हालांकि, किसी दूसरी पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करना सीधे तौर पर विधानसभा सदस्यता जाने का आधार बनेगा या नहीं, यह परिस्थितियों और उपलब्ध सबूतों पर निर्भर करेगा. संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत किसी विधायक को अयोग्य ठहराने का एक आधार यह है कि वह स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ दे. इसके लिए औपचारिक इस्तीफा देना जरूरी नहीं होता है.

सुप्रीम कोर्ट ने रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट किया था कि विधायक के आचरण से भी यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उसने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है.

इसलिए, अनंत सिंह की गतिविधियां किस तरह की थीं, पार्टी के निर्देश क्या थे और उनके खिलाफ कौन-से सबूत पेश किए जाते हैं, यह सब विधायकी पर फैसले में अहम होगा.

क्या है दल-बदल कानून और अनंत सिंह पर कैसे लागू?

दल-बदल विरोधी कानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल है, जिसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए जोड़ा गया था. इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दल बदलने के आधार पर सांसदों और विधायकों की सदस्यता जाने से जुड़े नियम तय करना है. इस कानून के तहत मुख्य रूप से दो स्थितियों में किसी सदस्य को अयोग्य ठहराया जा सकता है:

  • स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ना: यदि विधायक ने औपचारिक इस्तीफा न भी दिया हो, लेकिन उसके आचरण से यह साबित हो कि उसने अपनी पार्टी छोड़ दी है.
  • पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान करना: सदन में पार्टी के अधिकृत निर्देश यानी व्हिप के खिलाफ मतदान करना या बिना अनुमति मतदान से अनुपस्थित रहना भी अयोग्यता का आधार बन सकता है.
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अनंत सिंह के मामले में मुख्य सवाल यह होगा कि क्या उनके आचरण को स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ने के रूप में देखा जा सकता है. चूंकि मामला विधान परिषद चुनाव में दूसरी पार्टी के उम्मीदवार के समर्थन का है, इसलिए इसकी परिस्थितियों और सबूतों की गहन जांच जरूरी होगी.

पार्टी से निष्कासन के बाद भी कैसे लागू हो सकता है कानून?

यह इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है. आमतौर पर यह लग सकता है कि जब किसी विधायक को उसकी पार्टी ने निकाल दिया, तो वह उस पार्टी का सदस्य नहीं रहा. लेकिन दल-बदल कानून के संदर्भ में मामला इतना सीधा नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने जी. विश्वनाथन बनाम तमिलनाडु विधानसभा के अध्यक्ष मामले में स्पष्ट किया था कि किसी सदस्य को पार्टी से निष्कासित कर देने भर से दल-बदल कानून के लिए उसकी स्थिति अपने आप नहीं बदल जाती. ऐसे सदस्य को इस कानून के तहत मूल राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ माना जा सकता है.

इसलिए, अनंत सिंह को JDU से निष्कासित किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि अब दल-बदल कानून के तहत उनकी सदस्यता पर विचार नहीं हो सकता. उनके खिलाफ कार्रवाई का आधार और उसके समर्थन में मौजूद तथ्य अलग से जांचे जाएंगे.

विधायकी रद्द कराने के लिए JDU को क्या करना होगा?

अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता रद्द कराने के लिए JDU को एक तय प्रक्रिया का पालन करना होगा. प्रभात खबर के पॉलिटिकल एडिटर मिथिलेश कुमार के अनुसार, JDU को अनंत सिंह के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाने होंगे. पार्टी को यह दिखाना होगा कि उन्होंने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर गतिविधियां कीं. इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष की ओर से विधानसभा अध्यक्ष को औपचारिक पत्र दिया जा सकता है. इस प्रक्रिया को आसान भाषा में ऐसे समझा जा सकता है:

  1. सबूत जुटाना: JDU को अनंत सिंह के उन बयानों, चुनाव प्रचार और दूसरी गतिविधियों से जुड़े दस्तावेज जुटाने होंगे, जिनके आधार पर पार्टी यह दावा कर रही है कि उन्होंने पार्टी लाइन का उल्लंघन किया. केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं होगा.
  2. विधानसभा अध्यक्ष को आवेदन: पार्टी को अपने आरोपों और सबूतों के साथ विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष सदस्यता समाप्त करने की मांग रखनी होगी. आवेदन में यह स्पष्ट करना होगा कि अनंत सिंह का कौन-सा आचरण संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के तहत आता है.
  3. आरोपों की जांच और जवाब का मौका: आवेदन मिलने के बाद विधानसभा अध्यक्ष मामले पर विचार कर सकते हैं. जरूरत पड़ने पर अनंत सिंह को नोटिस जारी कर उनका पक्ष पूछा जा सकता है. उन्हें आरोपों का जवाब देने और अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने 2021 के एक फैसले में भी कहा था कि ऐसे मामलों में संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए और जहां जरूरी हो, वहां साक्ष्य पेश किए जाने चाहिए.
  4. विधानसभा अध्यक्ष का फैसला: दोनों पक्षों की बात और उपलब्ध सबूतों पर विचार करने के बाद विधानसभा अध्यक्ष फैसला ले सकते हैं. यदि यह निष्कर्ष निकलता है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की शर्तें पूरी होती हैं, तो अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता समाप्त की जा सकती है. इस फैसले को उचित आधार पर अदालत में चुनौती भी दी जा सकती है.
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अनंत सिंह का पक्ष भी क्यों अहम होगा?

अनंत सिंह पहले कह चुके हैं कि वह JDU के कार्यकर्ता हैं और विधान परिषद का चुनाव पार्टी आधारित चुनाव नहीं है. ऐसे में यदि उनके खिलाफ सदस्यता समाप्त करने की याचिका आती है, तो उनका पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा. विधानसभा अध्यक्ष को यह देखना होगा कि पार्टी की ओर से लगाए गए आरोपों के समर्थन में पर्याप्त सबूत हैं या नहीं. साथ ही, यह भी जांचना होगा कि संबंधित गतिविधियां दल-बदल कानून के दायरे में आती हैं या नहीं.

पार्टी से निष्कासन और विधायकी जाने में अंतर होता है. JDU ने अनंत सिंह को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया है और उनकी प्राथमिक सदस्यता रद्द कर दी है, जो पार्टी का संगठनात्मक फैसला है. वहीं, विधानसभा सदस्यता समाप्त करना संविधान के तहत अयोग्यता से जुड़ा मामला है, जिसके लिए संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई और विधानसभा अध्यक्ष का फैसला जरूरी है.

इसलिए, केवल पार्टी से निष्कासन के आदेश के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि अनंत सिंह की विधायकी निश्चित रूप से समाप्त हो जाएगी. इसका अंतिम फैसला संवैधानिक प्रक्रिया, सबूतों की मजबूती और विधानसभा अध्यक्ष की कार्रवाई पर निर्भर करेगा.

अनंत सिंह का राजनीतिक सफर और अब नया मोड़

अनंत सिंह की राजनीतिक यात्रा में भी कई बड़े मोड़ आए हैं। AK-47 मामले में सजा होने के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता चली गई थी। इसके बाद 2022 में मोकामा सीट पर उपचुनाव हुआ, जिसमें उनकी पत्नी नीलम देवी RJD के टिकट पर चुनाव लड़ीं और विधायक बनीं। बाद में पटना हाईकोर्ट से अनंत सिंह को राहत मिली और उनकी सजा रद्द हो गई। इसके बाद 2025 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने JDU के टिकट पर मोकामा से चुनाव लड़ा और जीतकर एक बार फिर विधानसभा पहुंचे। अब JDU से छह साल के लिए निष्कासन और विधानसभा सदस्यता रद्द करने की सिफारिश के बाद अनंत सिंह की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है। नीलम देवी पर हुई कार्रवाई ने 2024 के फ्लोर टेस्ट के दौरान उनके बदले राजनीतिक रुख को भी फिर से चर्चा में ला दिया है। आने वाले दिनों में इस फैसले के राजनीतिक प्रभाव और भी गहरे हो सकते हैं।

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