सुना है धन का जोर मधुबनी में काम कर गया, धन पर बिक गए गरीबों के रखवाले, अब क्या करें बेटिकट बेचारे
चुनावी डेस्क, देशज टाइम्स। इसे चुनाव कहते हैं। यही राजनीति है। यहां चेहरे नहीं दिल की आवाज सुनी जाती है दिमाग से तिकड़मी चाल चला जाता है। यहां इस राजनीति में जो सबसे सीधा है वो शतरंज का घोड़ा है चलता है तो एकबार में ढ़ाई घर। यही वजह है, दरभंगा व मधुबनी के तीन धुंरधरों की धुरी यहां से खिसकती नजर आ रही है। कभी एक दूसरे के घुर विरोधी रहे कीर्ति और अली अशरफ फातमी आज अपनी ही पार्टी के मारे हैं बेचारे। कीर्ति को पश्चिम चंपारण, वाल्मीकिनगर, दिल्ली कहां कहां नहीं पार्टी घुमा रही वहीं फातमी को दरभंगा से पहले मधुबनी खिसकाया अब वहां से भी पत्ता साफ कर दिया।
सुना है धन का जोर मधुबनी में काम कर गया। नई पार्टी बनी पैसे की कमी थी या नहीं अलग बात है धन लिया टिकट थमाने की बात कही जा रही है। स्वयं फातमी ने प्रेस वार्ता में इसपर गरजे। मगर, एक नाम है जो छुपा है, वो है कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रवक्ता, मधुबनी का कभी सांसद, आज टिकट के लिए दूर कतार से बाहर होता मगर जोश अब भी वही कहते हैं, मधुबनी से निर्दलीय लड़ूंगा। मगर सवाल यही आखिर मधुबनी से कितने लोग निर्दलीय लड़ेंगे लेकिन भाई डॉ. शकील अहमद की तो बात ही कुछ और है। सो, अब पाला पूरी तरह कांग्रेस की लाचारी पर टिकी है कुनबा बचाए या दीवानों की फौज खड़ी कर ले।









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