Mithila Culture: दरभंगा जिले के जाले प्रखंड स्थित राढ़ी पश्चिमी पंचायत में मिथिला की लोक-संस्कृति इन दिनों एक बार फिर जीवंत हो उठी है. नवरात्र के पावन अवसर पर यहां झिझिया नृत्य और मां दुर्गा की आराधना का एक अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है. दीपों से जगमगाते घड़े, पारंपरिक लोकधुनें और उन पर थिरकती युवतियां श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं. यह नजारा भक्ति और क्षेत्र की समृद्ध परंपरा का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत कर रहा है.
कन्या पाठशाला के समीप मां दुर्गा की पूजा-अर्चना के बाद हर शाम संध्या आरती के साथ ही यह पारंपरिक झिझिया नृत्य शुरू हो जाता है. यहां शाक्त पद्धति से मां दुर्गा की आराधना की जाती है. इस नृत्य में युवतियां बांस के डंडों पर रखे 11 छिद्र वाले घड़े में दीप प्रज्ज्वलित कर मां दुर्गा के भैरवी स्वरूप की उपासना करती हैं. उनके साथ दर्जनों अन्य युवतियां भी सिर पर एक या दो छिद्र वाले घड़े लेकर इस नृत्य में शामिल होती हैं. महासप्तमी के दिन मां के नेत्र खुलने के बाद महाअष्टमी के अवसर पर दर्जनों छागरों की बलि भी दी गई.
सामुदायिक प्रयास से 1993 में शुरू हुई दुर्गा पूजा
ग्रामीण बद्रीनारायण झा के अनुसार, राढ़ी गांव में शारदीय नवरात्र के अवसर पर दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1993 में हुई थी. उस समय रेलवे कर्मचारी रहे स्व. सुशील झा को अपनी धार्मिक मनौतियों के कारण पूजा में अंशदान देने के लिए जाले, रतनपुर और पड़ोसी जिला सीतामढ़ी के चकौती तक जाना पड़ता था. गांव के लोगों को भी मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए दूसरे स्थानों पर जाना पड़ता था. इस परेशानी को देखते हुए गांव के प्रबुद्ध लोगों ने राढ़ी में ही दुर्गा पूजा शुरू करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया.
अतिक्रमण से बचाने को खाली जमीन पर बना मंदिर
ग्रामीणों ने बताया कि गांव के महादेव मंदिर के पश्चिम में स्थित एक बड़े तालाब के दक्षिणी भिंडे पर करीब 40 डिसमिल जमीन में कन्या पाठशाला स्थापित थी, जो अब उत्क्रमित होकर प्लस टू उच्च माध्यमिक विद्यालय बन चुकी है. इसी तालाब के पश्चिमी भिंडे की जमीन खाली पड़ी हुई थी. इस खाली जमीन पर अतिक्रमण की आशंका को देखते हुए ग्रामीणों ने यहां दुर्गा मंदिर स्थापित कर विधि-विधान से पूजा शुरू करने का निर्णय लिया.
वर्ष 1993 में ही तालाब के पश्चिमी भिंडे की इस खाली जमीन पर दुर्गा मंदिर की स्थापना की गई. पूजा समिति के संस्थापक अध्यक्ष सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य स्व. हरिकांत झा थे. स्व. सत्यनारायण झा उर्फ नेताजी, स्व. उमेश झा, कुशेश्वर झा, स्व. अर्जुन झा, लक्ष्मेश्वर झा और बद्रीनारायण झा जैसे संस्थापक सदस्यों ने इस पहल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. वर्तमान में इसी स्थल पर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जा रही है.
वर्तमान समिति संभाल रही आयोजन की कमान
वर्तमान में सुमन कुमार झा पूजा समिति के अध्यक्ष पद पर हैं, जबकि रंजीत कुमार झा सचिव और हरिकृष्ण झा उपसचिव की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. मुन्ना झा को कोषाध्यक्ष बनाया गया है. इनके नेतृत्व में ग्रामीणों के सामूहिक सहयोग से दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन सफलतापूर्वक किया जा रहा है. यह आयोजन क्षेत्र में भक्ति और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के सामुदायिक संकल्प को दर्शाता है.








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