Allahabad High Court Shiksha Mitra: उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षामित्रों को एक बड़ा झटका दिया है। न्यायालय ने स्पेशल शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) 2026 में शामिल होने की मांग वाली 221 शिक्षामित्रों की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि यह विशेष टीईटी कोई नई भर्ती प्रक्रिया नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत सेवारत नियमित शिक्षकों के लिए अनिवार्य योग्यता पूरी करने का एक विशेष अवसर है। न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने वसीम अहमद समेत अन्य शिक्षामित्रों की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश सुनाया।
शिक्षामित्रों की दलीलें और कोर्ट का रुख
मामले के तथ्यों के अनुसार, उत्तर प्रदेश शासन ने पिछले दो सितंबर को एक शासनादेश जारी किया था। इसके बाद, उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग ने तीन सितंबर को परीक्षा की अधिसूचना जारी की। याचिकाकर्ता शिक्षामित्रों ने इस शासनादेश और अधिसूचना को चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि वे लगभग 26 वर्षों से परिषदीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में नियमित सहायक अध्यापकों की तरह शिक्षण कार्य कर रहे हैं। एनसीटीई की न्यूनतम अर्हता रखने के बावजूद, उन्हें स्पेशल टीईटी से बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 16 (अवसर की समानता) का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सेवारत शिक्षकों को टीईटी पास करने के लिए 31 अगस्त 2028 तक का समय दिया है, इसलिए उन्हें भी अपनी सेवा सुरक्षा और भविष्य के लिए इस परीक्षा में बैठने का अवसर मिलना चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा, ‘स्पेशल टीईटी कोई नई भर्ती प्रक्रिया नहीं है, बल्कि सेवारत (इन-सर्विस) नियमित शिक्षकों के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार अनिवार्य योग्यता पूरी करने का एक विशेष अवसर है।’
आयोग और राज्य सरकार ने शिक्षामित्रों की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (अंजुमन इशअत-ए-तालीम ट्रस्ट व समीक्षा याचिका आदेश) के अनुपालन में केवल उन इन-सर्विस शिक्षकों को छूट/अवसर दिया गया है, जिनकी नियुक्ति टीईटी अनिवार्य होने से पहले हो चुकी थी और जिनकी सेवा निरंतरता टीईटी पास करने पर निर्भर है। सरकार ने स्पष्ट किया कि शिक्षामित्र संविदा व्यवस्था के तहत कार्यरत हैं और वे नियमित इन-सर्विस शिक्षकों के समकक्ष नहीं हैं। साथ ही, यह भी बताया गया कि जुलाई 2026 में आयोजित नियमित टीईटी परीक्षा में आवेदन करने के लिए शिक्षामित्र पात्र थे, लेकिन उन्होंने उसमें भाग नहीं लिया।
स्पेशल टीईटी का उद्देश्य और भविष्य की संभावनाएं
न्यायालय ने शिक्षामित्रों की दलीलों को खारिज करते हुए अपने फैसले में कहा कि स्पेशल टीईटी किसी नई नियुक्ति, पद सृजन या पदोन्नति का माध्यम नहीं है। यह केवल उन सेवारत शिक्षकों के लिए एक संक्रांतिकालीन व्यवस्था है, जिनकी नौकरी बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने टीईटी पास करना अनिवार्य किया है। कोर्ट ने आगे कहा कि शिक्षामित्रों की नियुक्ति का स्वरूप और विधिक दर्जा नियमित सहायक अध्यापकों से पूरी तरह भिन्न है। इसलिए, असमान वर्गों को एक समान नहीं माना जा सकता और सेवारत शिक्षकों के लिए विशेष परीक्षा कराना अनुच्छेद 14 या 16 का उल्लंघन नहीं है। यूपी सरकार ने यह शासनादेश सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत ही जारी किया है और हाईकोर्ट अपनी मर्जी से सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के दायरे को नहीं बढ़ा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया, ‘टीईटी किसी नई नियुक्ति, पद सृजन या पदोन्नति का माध्यम नहीं। शिक्षामित्रों की नियुक्ति का स्वरूप और विधिक दर्जा नियमित सहायक अध्यापकों से पूरी तरह भिन्न है।’
इसी मुद्दे पर प्रतीक मिश्र व दो अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए, उनके अधिवक्ता अग्निहोत्री कुमार त्रिपाठी और सरकारी वकील को सुनने के बाद, कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। हालांकि, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को यह छूट दी है कि यदि भविष्य में भर्ती प्रक्रिया के दौरान राज्य सरकार स्पेशल टीईटी प्राप्त शिक्षकों को नियमों के विरुद्ध कोई अनुचित वरीयता या आरक्षण देती है, तो वे उसके खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं। यह फैसला शिक्षामित्रों के लिए आगे की कानूनी लड़ाई की संभावनाओं को खुला रखता है, बशर्ते भविष्य में कोई अनियमितता सामने आए।







