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घुटनों के बल बाबा धाम! बेटे का साथ, इस कांवड़िए की तपस्या देख आंखें नम हो जाएंगी| पढ़िए – लखीसराय के सुबोध और सुल्तानगंज से बाबा धाम तक – खास प्रण

Bihar Kanwar Yatra: लखीसराय के सुबोध कुमार सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवड़ यात्रा घुटनों के बल कर रहे हैं। पांच किलोमीटर में ही घुटने छिल गए, फिर भी हौसला चट्टान सा है।

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Bihar Kanwar Yatra: बिहार में Bihar की कांवड़ यात्रा के दौरान आस्था और अटूट संकल्प की एक अद्भुत तस्वीर सामने आई है। लखीसराय के रहने वाले सुबोध कुमार घुटनों के बल बाबा बैद्यनाथ धाम की कठिन यात्रा पर निकले हैं। यह मार्मिक दृश्य कांवड़िया पथ पर हर किसी को भावुक कर रहा है, जहां पांच से सात दिनों में उन्होंने सिर्फ सात किलोमीटर की दूरी तय की है। इस तपस्या में उनका बेटा हर कदम पर उनका सहारा बना हुआ है, जो पिता के आगे-आगे फोम बिछाता चल रहा है ताकि घुटनों को कुछ राहत मिल सके।

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घुटनों के बल बाबा धाम की कठिन यात्रा

भागलपुर के सुल्तानगंज से देवघर तक के कांवड़िया पथ पर श्रद्धालुओं की अलग-अलग आस्था और समर्पण के रंग दिखते हैं। कोई नंगे पांव चलता है, कोई दंडवत करता है, तो कोई अन्य कठिन तपस्या के साथ बाबा बैद्यनाथ के दरबार की ओर बढ़ता है। इन सब के बीच सुबोध कुमार की यात्रा सबसे अलग है। उनकी तपस्या का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पांच से सात दिन की यात्रा में वे अभी तक महज सात किलोमीटर ही चल पाए हैं। इस धीमी रफ्तार से उन्हें देवघर पहुंचने में दो महीने से भी अधिक का समय लग सकता है।

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यह यात्रा इतनी मुश्किल है कि केवल पांच किलोमीटर का सफर तय करने में ही सुबोध कुमार के दोनों घुटने बुरी तरह छिल चुके हैं। असहनीय पीड़ा के बावजूद, उनके चेहरे पर संकल्प और हौसले की कोई कमी नहीं दिखती। उनकी यह भक्ति, Bihar कांवड़ यात्रा की सच्ची मिसाल बन गई है।

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बेटे का अटूट साथ, प्रेरणा बनी यह तस्वीर

इस कठिन सफर में सुबोध कुमार के बेटे का साथ हर किसी के लिए प्रेरणा बन गया है। बेटा लगातार अपने पिता के आगे-आगे चलकर फोम बिछा रहा है, जिससे घुटनों को थोड़ी राहत मिल सके। यह दृश्य पिता-पुत्र के अटूट प्रेम और एक-दूसरे के प्रति समर्पण को दर्शाता है। सुबोध कुमार का कहना है कि वे चाहे जितना भी समय लगे या कितनी भी तकलीफ सहनी पड़े, बाबा भोलेनाथ के दरबार तक पहुंचकर ही दम लेंगे। उनकी यह दृढ़ इच्छाशक्ति और भक्ति कांवड़िया पथ पर अन्य श्रद्धालुओं के लिए भी प्रेरणा स्रोत बनी हुई है। यह देवघर यात्रा सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक बल की भी परीक्षा है।

‘चाहे जितना समय लगे, चाहे कितनी भी तकलीफ सहनी पड़े, लेकिन बाबा भोलेनाथ के दरबार तक पहुंचकर ही दम लेंगे।’

सुबोध कुमार की यह तपस्या आस्था, संकल्प और भगवान शिव के प्रति अटूट विश्वास का प्रतीक है। उनकी यह यात्रा बताती है कि सच्ची श्रद्धा के आगे शारीरिक बाधाएं छोटी पड़ जाती हैं। आगे भी उनकी यात्रा इसी तरह जारी रहेगी, जब तक वे अपने लक्ष्य, यानी बाबा बैद्यनाथ धाम, तक नहीं पहुंच जाते।

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