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नई उम्मीद जगी है : मैथिली है ‘कल्पवृक्ष’, देगी असीम रोजगार! दरभंगा में युवाओं को मिला करियर का नया मंत्र!

Darbhanga News: ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में आयोजित विशेष व्याख्यान में मैथिली को केवल भाषा नहीं, बल्कि करियर का सशक्त माध्यम बताया गया। अब युवाओं को सरकारी नौकरी के साथ स्वरोजगार के भी रास्ते दिख रहे हैं।

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Darbhanga News: दरभंगा में मैथिली भाषा को लेकर एक नई उम्मीद जगी है। आर.के. कॉलेज, मधुबनी के वरीय सहायक प्राध्यापक डॉ अरविन्द कुमार सिंह झा ने मैथिली को ‘कल्पवृक्ष’ बताते हुए इसमें रोजगार की असीम संभावनाओं का दावा किया है। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के विश्वविद्यालय मैथिली विभाग में आयोजित एक विशेष व्याख्यान में उन्होंने युवाओं को इस भाषा के माध्यम से करियर बनाने के कई अहम गुर सिखाए।यह कार्यक्रम विभागाध्यक्ष प्रो अरुण कुमार कर्ण की अध्यक्षता में संपन्न हुआ, जिसमें प्रमोद कुमार पासवान द्वारा संपादित पुस्तक ‘निबंध मंजरी’ का विमोचन भी किया गया। डॉ झा ने ‘मैथिली में रोजगार की संभावना’ विषय पर अपना विस्तृत व्याख्यान दिया, जिसमें विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।नई उम्मीद जगी है : मैथिली है 'कल्पवृक्ष', देगी असीम रोजगार! दरभंगा में युवाओं को मिला करियर का नया मंत्र!

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मैथिली केवल भाषा नहीं, रोजगार का सशक्त माध्यम

डॉ अरविन्द कुमार सिंह झा ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि मैथिली सिर्फ एक भाषा नहीं है, बल्कि रोजगार, ज्ञान और सांस्कृतिक समृद्धि का एक मजबूत जरिया है। उन्होंने इस भाषा को ‘कल्पवृक्ष’ की संज्ञा देते हुए कहा कि यह शिक्षा, शोध, अध्यापन, अनुवाद, पत्रकारिता, प्रकाशन, डिजिटल मीडिया, सांस्कृतिक प्रबंधन और प्रशासनिक सेवाओं जैसे कई क्षेत्रों में अवसर प्रदान करती है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे भाषा और साहित्य को केवल भावनात्मक दृष्टिकोण से न देखें, बल्कि व्यावसायिक और व्यावहारिक नजरिए से भी समझें।

मैथिली केवल एक भाषा नहीं, बल्कि रोजगार, ज्ञान और सांस्कृतिक समृद्धि का सशक्त माध्यम है। यह कल्पवृक्ष के समान है, जिसके माध्यम से शिक्षा, शोध, अध्यापन, अनुवाद, पत्रकारिता, प्रकाशन, डिजिटल मीडिया, सांस्कृतिक प्रबंधन तथा प्रशासनिक सेवाओं सहित अनेक क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं।
– डॉ अरविन्द कुमार सिंह झा

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प्राथमिक शिक्षा से लेकर यूपीएससी तक मैथिली का महत्व

डॉ झा ने प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि पहली से दसवीं कक्षा तक मैथिली माध्यम में विभिन्न विषयों की किताबें उपलब्ध हैं। यदि इनका सही तरीके से क्रियान्वयन हो, तो शिक्षा की गुणवत्ता में काफी सुधार आ सकता है। मातृभाषा में शिक्षा से विद्यार्थियों की अभिव्यक्ति क्षमता, बौद्धिक विकास और रचनात्मक सोच मजबूत होती है।संविधान की अष्टम अनुसूची में मैथिली के शामिल होने के बाद इसे राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) समेत कई प्रतियोगी परीक्षाओं में मैथिली एक वैकल्पिक विषय के रूप में स्वीकार की जाती है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भी उच्च शिक्षा के स्तर पर मैथिली के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था है। हाल के वर्षों में मैथिली विषय के कई विद्यार्थी शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए हैं, जो इस क्षेत्र में बढ़ती संभावनाओं का स्पष्ट प्रमाण है।

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प्रकाशन, अनुवाद और न्यायिक क्षेत्रों में भी अवसर

डॉ अरविन्द झा ने प्रकाशन, पुस्तक लेखन, संपादन और अनुवाद को रोजगार का एक उभरता हुआ क्षेत्र बताया। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में क्षेत्रीय भाषाओं की सामग्री की मांग लगातार बढ़ रही है। साहित्य अकादमी, भारतीय भाषा संस्थान और विभिन्न सरकारी-गैर-सरकारी संस्थानों द्वारा चलाए जा रहे अनुवाद परियोजनाओं में कुशल अनुवादकों की हमेशा आवश्यकता रहती है। मैथिली के विद्यार्थियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण मौका है।न्यायिक क्षेत्र में भी मैथिली की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि जिला न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक मैथिली में आवेदन देने और अपना पक्ष रखने की व्यवस्था है, हालांकि इसका प्रभावी क्रियान्वयन अभी अपेक्षित स्तर तक नहीं हो पाया है। उन्होंने मैथिली के व्यावहारिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर ठोस पहल की आवश्यकता बताई।

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सरकारी नौकरी से आगे स्वरोजगार की राह

अध्यक्षीय संबोधन में विभागाध्यक्ष प्रो अरुण कुमार कर्ण ने विद्यार्थियों को सलाह दी कि वे अपने लक्ष्यों को केवल सरकारी नौकरियों तक ही सीमित न रखें। उन्होंने स्वरोजगार, शोध, लेखन, संपादन, डिजिटल कंटेंट निर्माण, लोकसंस्कृति संरक्षण और भाषा-आधारित उद्यमिता के क्षेत्र में भी व्यापक संभावनाओं की बात कही। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण अध्ययन, निरंतर शोध और नवाचारी दृष्टिकोण से मैथिली भाषा का विकास और युवाओं का भविष्य दोनों सशक्त हो सकते हैं।कार्यक्रम का शुभारंभ प्रमोद कुमार पासवान की भावपूर्ण जानकी वंदना से हुआ। उन्होंने अपनी संपादित पुस्तक ‘निबंध मंजरी’ के बारे में जानकारी दी, जिसमें विभिन्न विद्वानों के कुल 21 मैथिली शोध आलेख शामिल हैं। मैथिली विभाग के वरीय सहायक प्राध्यापक डॉ सुरेश पासवान और सहायक प्राध्यापिका डॉ अभिलाषा कुमारी ने भी अपने विचार रखे। शोधार्थी राजनाथ पंडित ने कार्यक्रम का सफल संचालन किया। इस अवसर पर पवन कुमार महतो, मनोज कुमार, मनीष कुमार, शिवम कुमार झा, राहुल राज गुप्ता, प्रियंका कुमारी, प्रवीण कुमार, मनोज कुमार पंडित, नेहा कुमारी, मिथिलेश कुमार साहनी सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी और गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे। विभागीय कर्मचारी नरेन्द्र कुमार की भी सक्रिय उपस्थिति रही।

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