Bihar Assembly Election 1995: करीब 31 साल पहले, बिहार की राजनीति में एक ऐसा अध्याय लिखा गया, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के बीच सीधा टकराव सामने आया। यह घटना 1995 बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान की है, जिसने राज्य की चुनावी प्रक्रिया और राजनीतिक विमर्श को हमेशा के लिए बदल दिया। शेषन की सख्ती ने जहां निष्पक्ष चुनाव का मार्ग प्रशस्त किया, वहीं लालू प्रसाद ने इसी सख्ती को अपनी जीत का आधार बना लिया।
उस दौर में टीएन शेषन के फैसलों से लालू प्रसाद यादव इतने नाराज थे कि उन्होंने इसे अपनी चुनावी सभाओं का मुख्य मुद्दा बना लिया। शेषन लगातार चुनाव की तारीखें बदल रहे थे, जिसका मकसद बिहार में बूथ कैप्चरिंग और हिंसा को रोकना था।
शेषन कौन है? जब लालू ने सीईओ को लगाई थी फटकार
तत्कालीन मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) आरजेएम पिल्लई और मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के बीच हुई एक बातचीत आज भी चर्चा में है। बताया जाता है कि लालू प्रसाद ने पिल्लई को फोन कर अपनी नाराजगी व्यक्त की थी।
‘बिहार का मैं मुख्यमंत्री हूं और तुम मेरे अफसर हो। फिर ई शेषनवां कौन है? बीच में काहे टपकता रहता है? बार-बार फैक्स भेजता रहता है! एक बार चुनाव हो जाने दो, सब फैक्स-वैक्स उड़ा देंगे।’
इस घटना के बाद, लालू प्रसाद ने टीएन शेषन के साथ अपने इस टकराव को खुलकर चुनावी मुद्दा बनाया। उन्होंने शेषन के फैसलों पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए, आरोप लगाया कि पिछड़े वर्ग के बेटे को सत्ता से हटाने के लिए ऐसे निर्णय लिए जा रहे हैं। इस तरह उन्होंने सामाजिक और जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश की।
लंबी चुनाव प्रक्रिया बनी लालू की रणनीति का हिस्सा
वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर अपनी किताब ‘बंधु बिहारी’ में इस घटनाक्रम का जिक्र करते हैं। वे लिखते हैं कि लालू यादव सार्वजनिक सभाओं में शेषन पर निशाना साधते थे, लेकिन अंदर ही अंदर लंबी चुनाव प्रक्रिया से खुश थे। इसका कारण यह था कि उन्हें चुनाव प्रचार के लिए पर्याप्त समय मिल रहा था। शेषन को निशाने पर लेकर लालू प्रसाद यह संदेश देने में सफल रहे कि पिछड़े वर्ग के नेता को सत्ता से हटाने का प्रयास किया जा रहा है। इस राजनीतिक रणनीति का लाभ उन्हें चुनाव परिणामों में साफ दिखाई दिया। 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले जनता दल ने 1990 की तुलना में अधिक सीटें हासिल कीं और राज्य में अपनी सत्ता बरकरार रखी।
वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडेय बताते हैं कि शेषन की सख्ती के कारण चुनाव प्रक्रिया में बदलाव आया, जिससे पहले मतदान से दूर रहने वाले गरीब और दलित वर्ग के लोग भी वोट डालने के लिए निकले। इससे मतदान प्रतिशत बढ़ा, जिसने लालू प्रसाद को 1990 के मुकाबले अधिक सीटें हासिल करने में मदद की।
बिहार में निष्पक्ष चुनाव शेषन के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई
बिहार में चुनाव के दौरान बूथ कैप्चरिंग और हिंसा की घटनाएं उस दौर में आम थीं। मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के लिए बिहार में निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराना एक बड़ी चुनौती बन गया था। इसी कारण 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों में कई बार बदलाव किए गए। शेषन ने पत्रकारों से बातचीत में बिहार की चुनावी परिस्थितियों पर विशेष चिंता जताई थी।
‘बिहार पर थोड़ा अतिरिक्त ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि आखिर में ऐसा नहीं कहा जाना चाहिए कि बाकी हर जगह शानदार काम हुआ, लेकिन बिहार में हम असफल रहे।’
शेषन की सख्ती से लालू प्रसाद नाराज थे, वहीं उनके लिए बिहार में निष्पक्ष चुनाव कराना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका था। दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब ‘द ब्रदर्स बिहारी’ में भी इस टकराव का उल्लेख किया है। हिंसा और बूथ कब्जाने की घटनाओं को रोकने के लिए शेषन ने बिहार में करीब 650 कंपनियां अर्धसैनिक बलों की तैनात कराईं और विधानसभा चुनाव चार चरणों में संपन्न कराए।
चुनाव के दौरान बिहार में चुनावी हिंसा का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसे शेषन ने अपनी सख्ती से नियंत्रित करने का प्रयास किया। नीचे दी गई तालिका विभिन्न चुनावों में हुई मौतों की संख्या दर्शाती है:
| चुनाव वर्ष | चुनाव का प्रकार | मौतें |
|---|---|---|
| 1984 | लोकसभा चुनाव | 24 |
| 1989 | लोकसभा चुनाव | 40 |
| 1985 | विधानसभा चुनाव | 63 |
| 1990 | विधानसभा चुनाव | 87 |
| 1995 | विधानसभा चुनाव | 54 |
यह आंकड़ा दर्शाता है कि 1995 के चुनाव में शेषन की सख्ती के बावजूद हिंसा पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी, लेकिन इसमें कुछ कमी जरूर आई थी, खासकर 1990 के मुकाबले।
‘आपके आसपास बम फटेंगे और गोली चलेंगी’
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी, जो 1995 के बिहार चुनाव में पर्यवेक्षक के रूप में तैनात थे, ने उस दौर की चुनौतियों को याद किया। उन्होंने बताया कि शेषन ने उनसे कहा था:
‘चिंता मत करो, कुछ नहीं होगा, सिवाय आपके आसपास बम फटने और गोली चलने के।’
कुरैशी के मुताबिक, उनके साथ ऐसा ही हुआ, जिस जगह वे खड़े थे, उससे कुछ ही दूरी पर दो बम धमाके हुए। यह घटना उस समय बिहार में चुनाव कराने की गंभीर चुनौतियों को दर्शाती है। टीएन शेषन की सख्ती और लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक दांव-पेच के बीच 1995 का बिहार विधानसभा चुनाव कई मायनों में यादगार रहा। एक तरफ निर्वाचन आयोग निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने में जुटा था, तो दूसरी तरफ लालू प्रसाद ने शेषन के फैसलों को अपने चुनावी विमर्श का हिस्सा बना लिया, जिसने अंततः उन्हें सत्ता में बनाए रखा।







