Patna High Court: पटना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि बिजली का बिल जमा न करना अपने आप में बिजली चोरी नहीं है। कोर्ट ने बिजली चोरी के आरोप में दर्ज एक प्राथमिकी (FIR) को रद्द करते हुए इस मामले में घरेलू उपभोक्ता को बड़ी राहत दी है। यह फैसला बिजली विभाग द्वारा मनमाने ढंग से दर्ज किए जाने वाले मुकदमों पर रोक लगाएगा और उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करेगा।
क्या है पटना हाई कोर्ट का पूरा फैसला?
न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार की पीठ ने मोहम्मद शाहिद इमाम द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बकाया बिजली बिल और उसका भुगतान करने में विफलता से बिजली चोरी का आपराधिक अपराध स्थापित नहीं होता है। यह मामला तब सामने आया जब बिजली विभाग ने शाहिद इमाम की बिजली आपूर्ति ₹5.39 लाख के बकाया बिल के कारण काट दी थी।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल बकाया बिजली बिल के कारण किसी व्यक्ति पर बिजली चोरी का आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। इसके लिए बेईमान इरादे का प्रमाण आवश्यक है।
कनेक्शन काटे जाने के बावजूद, उनके खिलाफ बिजली के अनाधिकृत उपयोग के आरोप में भारतीय विद्युत अधिनियम की धारा 135 के तहत एक एफआईआर दर्ज की गई थी। शाहिद इमाम ने आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
धारा 135 और धारा 126 में अंतर
अदालत ने बिजली के अनाधिकृत उपयोग और बिजली चोरी के बीच अंतर स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि धारा 135 के तहत अपराध स्थापित करने के लिए अभियोजन पक्ष को बेईमान इरादे (dishonest intention) को साबित करना होगा। केवल यह साबित करना कि एक बिजली उपभोक्ता ने बकाया बिलों का भुगतान नहीं किया है, इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
इसके विपरीत, धारा 126 के तहत अनाधिकृत उपयोग के कारण नागरिक दायित्व उत्पन्न हो सकता है और इसके लिए बेईमान इरादे के प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है। इसका अर्थ है कि यदि कोई व्यक्ति बिना अनुमति के बिजली का उपयोग करता है, तो उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है, लेकिन आपराधिक मुकदमा तभी चलेगा जब चोरी का इरादा साबित हो।
सिविल वसूली संभव, आपराधिक केस नहीं
उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बिजली विभाग बकाया राशि की वसूली के लिए सिविल कार्यवाही करने का हकदार है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि विभाग बकाया बिल को धारा 135 के तहत आपराधिक मामले में तब तक नहीं बदल सकता जब तक कि बिजली चोरी के तत्वों को स्थापित न कर दिया जाए।
शाहिद इमाम की याचिका को स्वीकार करते हुए, अदालत ने एफआईआर को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में एक बकाया बिजली बिल और बिजली चोरी का आपराधिक आरोप एक दूसरे के स्थान पर उपयोग नहीं किए जा सकते हैं। इस फैसले के बाद, बिहार में बिजली विभाग को बकाया बिलों की वसूली के लिए कानूनी प्रक्रियाओं का अधिक सावधानी से पालन करना होगा और उपभोक्ताओं को अनावश्यक आपराधिक मुकदमों से राहत मिलेगी।







