Patna News: पटना हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में डॉन बॉस्को एकेडमी, पटना द्वारा नौवीं कक्षा के एक छात्र के निष्कासन को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि नाबालिग के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई स्थापित नियमों, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और आनुपातिकता के अनुरूप होनी चाहिए। न्यायमूर्ति हरीश कुमार की एकल पीठ ने स्कूल के 17 अक्टूबर, 2025 के निष्कासन आदेश को निरस्त करते हुए संस्थान को छात्र को वापस कक्षाओं में शामिल होने और शैक्षणिक गतिविधियों में भाग लेने का निर्देश दिया।
स्कूल ने छात्र पर क्या आरोप लगाए थे?
स्कूल ने छात्र के निष्कासन के पीछे अनुशासनहीनता को मुख्य कारण बताया था। स्कूल प्रबंधन के अनुसार, छात्र लगातार कक्षाएं छोड़ता था, शिक्षकों की बात नहीं मानता था और एक अन्य छात्र के साथ शारीरिक altercation में भी शामिल था। संस्थान ने यह भी दावा किया कि छात्र को कई बार चेतावनी और परामर्श सत्र दिए गए थे, लेकिन उसके व्यवहार में कोई सुधार नहीं आया। स्कूल ने अपने नियमों का हवाला दिया था, जिसमें गंभीर कदाचार के मामलों में निष्कासन का प्रावधान है।

कोर्ट ने निष्कासन को क्यों बताया गलत?
हाई कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि स्कूल के प्रधानाचार्य को छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है। हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि निष्कासन अनुशासनात्मक दंड का सबसे गंभीर रूप है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि केवल कक्षाएं छोड़ना स्कूल के नियमों में विशेष रूप से निष्कासन योग्य अपराध के रूप में उल्लिखित नहीं था। कोर्ट ने यह भी कहा कि कथित शारीरिक altercation की प्रकृति, गंभीरता और आसपास की परिस्थितियों के आधार पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि निष्कासन आदेश इन कारकों पर पर्याप्त विचार किए बिना पारित किया गया था।
न्यायमूर्ति हरीश कुमार ने अपने फैसले में कहा, “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत, गंभीर अनुशासनात्मक परिणामों का सामना कर रहे छात्र को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए। नाबालिगों पर अनुशासनात्मक उपाय लागू करते समय आनुपातिकता का विशेष महत्व है।”
हाई कोर्ट ने यह भी नोट किया कि छात्र को उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों का जवाब देने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया था। कोर्ट ने जोर दिया कि जहां सुधार की संभावना हो, वहां स्कूलों को सुधारात्मक उपायों पर विचार करना चाहिए। ऐसे उपायों में चेतावनी, परामर्श और छात्र के आचरण की निगरानी शामिल हो सकती है, खासकर नाबालिग छात्रों से जुड़े मामलों में, निष्कासन का सहारा लेने से पहले। कोर्ट की यह टिप्पणी स्कूलों की अनुशासनात्मक और सुधारात्मक भूमिका पर बल देती है।
निजी स्कूलों पर भी न्यायिक समीक्षा
इस फैसले में निजी, गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की कानूनी स्थिति पर भी बात की गई। हाई कोर्ट ने कहा कि निजी स्कूल शिक्षा प्रदान करने का सार्वजनिक कार्य करते हैं। नतीजतन, उनके कार्यों की न्यायिक समीक्षा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उचित मामलों में की जा सकती है, खासकर जहां निष्पक्षता या वैधता के प्रश्न उठते हैं। इस टिप्पणी का अर्थ है कि निजी शैक्षणिक संस्थान शिक्षा से संबंधित कार्यों का प्रयोग करते समय संवैधानिक न्यायिक जांच के दायरे से पूरी तरह बाहर नहीं हैं। कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि छात्र की शैक्षणिक प्रगति निष्कासन के कारण प्रतिकूल रूप से प्रभावित न हो। यदि छात्र ने निष्कासन के कारण कोई अनिवार्य परीक्षा छोड़ दी है, तो स्कूल को उसे विशेष या पूरक परीक्षा में बैठने का अवसर प्रदान करना होगा। यह निर्देश अनुशासनात्मक विवाद को छात्र के लिए स्थायी शैक्षणिक परिणामों से रोकने के उद्देश्य से दिया गया है।







