Crude Oil: दिग्गज कारोबारी मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries) इन दिनों वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदने की संभावनाओं को लेकर सुर्खियों में है, एक ऐसा कदम जो न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है। इस संभावित सौदे ने तेल बाजार और रणनीतिक विश्लेषकों के बीच गहरी रुचि पैदा कर दी है, क्योंकि यह अमेरिका के प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार के जटिल ताने-बाने को दर्शाता है।
Crude Oil: रिलायंस का वेनेजुएला से तेल खरीदने का बड़ा दांव, क्या बदलेंगे भारत के ऊर्जा समीकरण?
Crude Oil खरीदने का रणनीतिक महत्व
रिलायंस इंडस्ट्रीज द्वारा वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदने की योजना सिर्फ एक व्यावसायिक लेन-देन से कहीं अधिक है; यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करने और पश्चिमी देशों के दबाव को संतुलित करने की एक गहरी रणनीति का हिस्सा है। बीते कुछ महीनों में अमेरिका के दबाव में आकर दुनिया के कई देश रूस से कच्चे तेल की खरीद कम कर रहे हैं। ऐसे में तेल की आपूर्ति भी बनी रहे और दूसरे देशों से भी तेल खरीदने के रास्ते खुले रहें, साथ ही पश्चिमी देशों के दबाव से भी बचा जा सके, इसके लिए रिलायंस अमेरिका की मंजूरी के साथ वेनेजुएला से तेल खरीदना चाहता है। इसके पीछे एक और अहम वजह यह भी है कि वेनेजुएला का कच्चा तेल ब्रेंट क्रूड से 5-8 डॉलर प्रति बैरल सस्ता होता है, क्योंकि वेनेजुएला के तेल में सल्फर की मात्रा अधिक होती है। रिलायंस के पास जामनगर स्थित अपनी रिफाइनरी में इसे प्रोसेस करने की पूरी क्षमता है, जिससे आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने के लिए वेनेजुएला का कच्चा तेल उसके लिए एक बेहतर विकल्प बन जाता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।


नॉन-प्रॉफिट थिंक टैंक, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी का मानना है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज को वेनेजुएला से क्रूड ऑयल खरीदने में मिडिल ईस्ट देशों के मुकाबले थोड़ा महंगा पड़ेगा। एक्स पर एक पोस्ट के जरिए ब्रह्मा चेलानी ने कहा कि रिलायंस वेनेजुएला का कच्चा तेल खरीदेगी, लेकिन खुद उस दक्षिण अमेरिकी देश से नहीं, बल्कि अमेरिका से, जिसने वहां बड़े पैमाने पर हमले किए और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर लिया। उन्होंने आगे कहा, वेनेजुएला का क्रूड ऑयल दरअसल शिपिंग कॉस्ट के साथ रिलायंस को मिडिल ईस्ट की आपूर्ति से थोड़ा ज्यादा महंगा पड़ेगा। दूसरे शब्दों में कहें तो तेल की यह खरीद मुख्य रूप से ट्रंप प्रशासन को एक राजनीतिक संकेत देने के लिए है।
अमेरिका की भूमिका और भुगतान का तरीका
बताया जा रहा है कि वेनेजुएला का लाखों बैरल तेल वहां के समुद्री टैंकरों और जहाजों में अटका हुआ है। इनमें से लगभग 30-50 मिलियन बैरल क्रूड ऑयल को अमेरिका मार्केट प्राइस पर दूसरे देशों को बेचने की तैयारी में है। इससे मिला पैसा ट्रंप के नियंत्रण में रहेगा, जिसका इस्तेमाल वेनेजुएला और अमेरिका के विकास में किया जाएगा।
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रिलायंस वेनेजुएला से कच्चा तेल पहले भी खरीदता था। यहां तक कि पिछले साल अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद रिलायंस को वेनेजुएला से क्रूड ऑयल मंगाने के लिए लाइसेंस मिले थे। हालांकि, फिर वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका ने PDVSA (वेनेजुएला की तेल कंपनी) के ज्यादातर बिजनेस पार्टनर्स के लाइसेंस निलंबित कर दिए। इसके चलते रिलायंस ने वहां से तेल की आपूर्ति रोक दी। तेल की खरीद के बाद इसके भुगतान को लेकर ब्रह्मा चेलानी ने कहा कि रिलायंस अमेरिकी बॉन्ड खरीदकर कच्चे तेल का भुगतान नहीं करेगी, बल्कि खबरों के मुताबिक वे बिक्री से मिली रकम को वैश्विक बैंकों में अमेरिकी-नियंत्रित खातों में जमा करेंगे। चेलानी ने कहा, “रिलायंस सीधे अमेरिकी ट्रेजरी को भुगतान नहीं करेगी। इसके बजाय, बिक्री से मिली रकम ‘विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त बैंकों’ में अमेरिकी-नियंत्रित खातों में जमा की जाएगी।” आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह व्यवस्था सुनिश्चित करेगी कि फंड का उपयोग अमेरिकी हितों और वेनेजुएला की स्थिरता के अनुसार हो, जबकि रिलायंस को एक महत्वपूर्ण तेल स्रोत तक पहुंच मिल सके। यह डील भारत की ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक तेल बाजार में उसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाती है।







