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शर्मिला टैगोर: ‘कश्मीर की कली’ जिसने तोड़ी परंपराएं, बनीं सिनेमा की बेताज बादशाह

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भारतीय सिनेमा में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं रहते, बल्कि एक युग की सोच को भी बदल देते हैं। ऐसी ही एक अदाकारा हैं शर्मिला टैगोर, जिन्हें ‘कश्मीर की कली’ कहकर लोग प्यार से पुकारते हैं। आज उनका जन्मदिन है और इस खास मौके पर हम जानेंगे उस बेबाक अभिनेत्री के जीवन की अनकही दास्तान, जिसने अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जी और पारंपरिक रूढ़ियों को तोड़कर सिनेमा में एक नई मिसाल पेश की।

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भारतीय सिनेमा की सबसे कुशल और सम्मानित अभिनेत्रियों में से एक, शर्मिला टैगोर का नाम आज भी दर्शकों के दिलों में अपनी एक ख़ास जगह रखता है। दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, एक फिल्मफेयर पुरस्कार, एक फिल्मफेयर ओटीटी पुरस्कार और फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार सहित कई सम्मानों से नवाज़ी जा चुकीं शर्मिला ने हिंदी सिनेमा पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2013 में देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया था। ‘कश्मीर की कली’ के नाम से मशहूर यह अदाकारा बांग्ला फिल्मों से हिंदी सिनेमा में आईं और अपनी दमदार अदाकारी से लाखों दिलों की धड़कन बन गईं।

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टैगोर परिवार की विरासत और अभिनय का आगाज़

शर्मिला टैगोर का जन्म 8 दिसंबर 1944 को एक ऐसे परिवार में हुआ, जिसका भारतीय कला और साहित्य पर गहरा प्रभाव रहा है। वह नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर की दूर की रिश्तेदार हैं और बंगाली पुनर्जागरण के महत्वपूर्ण स्तंभ रहे इस प्रतिष्ठित टैगोर परिवार की विरासत को आगे बढ़ाती हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा सेंट जॉन डायोकेसन गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल और आसनसोल के लोरेटो कॉन्वेंट में हुई। महज़ 14 साल की उम्र में, शर्मिला टैगोर ने सिनेमा की दुनिया में कदम रखा। यह शुरुआत किसी और के साथ नहीं, बल्कि महान फिल्म निर्माता सत्यजीत रे की क्लासिक बंगाली फिल्म “अपूर संसार” (1959) से हुई। रे उनकी प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी अगली फिल्म “देवी” (1960) में भी उन्हें कास्ट किया। यह फिल्म धार्मिक कट्टरता पर एक मार्मिक टिप्पणी थी, जिसमें शर्मिला ने दोयमयी का यादगार किरदार निभाया, एक युवा स्त्री जिसे देवी काली का अवतार मान लिया जाता है।

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सत्यजीत रे के साथ सिनेमाई जादू

सत्यजीत रे के साथ शर्मिला टैगोर का रचनात्मक रिश्ता कई फिल्मों तक चला, जिनमें उनकी अदाकारी के अलग-अलग रंग देखने को मिले। रे की फिल्म “नायक” (1966) में उन्होंने अदिति सेनगुप्ता नामक पत्रकार की भूमिका निभाई, जो एक ट्रेन यात्रा के दौरान एक प्रसिद्ध फिल्म स्टार का साक्षात्कार लेती है। “सीमाबद्ध” (1971) में शर्मिला ने टुटुल का किरदार निभाया, एक ऐसी युवा महिला जो कॉर्पोरेट जगत की चकाचौंध से मोहभंग का शिकार होती है। रे के साथ उनका एक और महत्वपूर्ण सहयोग “अरण्येर दिन रात्रि” (1970) में रहा, जो सुनील गंगोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित थी। यह फिल्म शहरी जीवन से त्रस्त चार दोस्तों की कहानी है, जो बिहार के जंगलों की यात्रा पर निकलते हैं। जंगल के आदिम परिवेश में ये दोस्त अपनी सोच, नैतिकता और मानवीय रिश्तों की गहरी पड़ताल करते हैं। इन फिल्मों में शर्मिला की सहज और सशक्त अदाकारी ने उन्हें समीक्षकों और दर्शकों दोनों के बीच स्थापित किया।

हिंदी सिनेमा में ‘कश्मीर की कली’ का उदय

बंगाली सिनेमा में अपनी पहचान बनाने के बाद, शर्मिला टैगोर ने 1964 में शक्ति सामंत की रोमांटिक फिल्म “कश्मीर की कली” से हिंदी सिनेमा में धमाकेदार एंट्री की। इस फिल्म में उन्होंने शम्मी कपूर के साथ एक खूबसूरत और मासूम कश्मीरी लड़की चंपा का किरदार निभाया, जिसे दर्शकों ने बेहद पसंद किया। फिल्म की जबरदस्त सफलता ने उन्हें रातोंरात स्टार बना दिया और वे हिंदी सिनेमा की अग्रणी अभिनेत्रियों की कतार में शामिल हो गईं। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

पुरस्कार और यादगार भूमिकाएं

शर्मिला टैगोर की बहुमुखी प्रतिभा ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म “अनुपमा” (1966) में भी खुलकर सामने आई। इस फिल्म में उन्होंने एक पिता-बेटी के जटिल रिश्ते को संवेदनशीलता से निभाया, जो प्रेम और उपेक्षा जैसे विषयों को दर्शाती थी। फिल्म की मार्मिक कहानी और शर्मिला सहित धर्मेंद्र के सशक्त अभिनय ने इसे यादगार बना दिया। शक्ति सामंत निर्देशित “आराधना” (1969) उनके करियर की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक मानी जाती है। वंदना त्रिपाठी के किरदार में, उन्होंने एक ऐसी महिला का चित्रण किया, जो अपने प्रेमी और बच्चे के पिता की दुखद मृत्यु के बाद अनगिनत चुनौतियों का सामना करती है। उनके इस भावनात्मक और दमदार अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद, शक्ति सामंत की एक और क्लासिक फिल्म “अमर प्रेम” (1972) में उन्होंने पुष्पा नामक एक दरबारी का किरदार निभाया, जिसने एक अमीर संरक्षक और एक परेशान लड़के के साथ गहरा रिश्ता बनाया। इस भूमिका में उनकी अभिनय की गहराई और संवेदनशीलता ने व्यापक प्रशंसा बटोरी।

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इन प्रमुख फिल्मों के अलावा, शर्मिला टैगोर ने अपनी लंबी फिल्मी यात्रा में कई अन्य यादगार फिल्में दीं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:

  • वक्त (1965)
  • एन इवनिंग इन पेरिस (1967)
  • सत्यकाम (1969)
  • चुपके चुपके (1975)
  • दाग (1973)

उनकी विस्तृत फिल्मोग्राफी में ‘देवर’ (1966), ‘आमने सामने’ (1967), ‘मेरे हमदम मेरे दोस्त’ (1968), ‘सफर’ (1970), ‘छोटी बहू’ (1971), ‘राजा रानी’ (1973), ‘आविष्कार’ (1974), ‘अमानुष’ (1974), ‘फरार’ (1975), ‘आनंद आश्रम’ (1977), ‘गृह प्रवेश’ (1979), ‘देश प्रेमी’ (1982) और ‘दूरदेश’ (1983) जैसी कई और सफल और प्रशंसित फिल्में शामिल हैं, जिन्होंने उन्हें हिंदी सिनेमा की एक बहुमुखी अदाकारा के रूप में स्थापित किया।

बहुमुखी प्रतिभा और देर से वापसी

गुलज़ार द्वारा निर्देशित “मौसम” (1975) ने शर्मिला टैगोर की अभिनय क्षमता का एक और आयाम दिखाया। इस फिल्म में उन्होंने चंदा और कजली की दोहरी भूमिकाएं निभाईं, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। गुलज़ार के साथ उनका अगला महत्वपूर्ण काम 1982 की फिल्म “नमकीन” में था, जिसमें संजीव कुमार, शबाना आज़मी और वहीदा रहमान जैसे कलाकार भी थे। यह फिल्म हिमाचल प्रदेश के एक दूरदराज के गाँव में जीवन के लिए संघर्ष कर रही चार महिलाओं की कहानी बयां करती है। टैगोर ने इसमें सबसे बड़ी बेटी ‘निमकी’ का किरदार निभाया, जो अपनी परिस्थितियों में फंसी एक महिला के यथार्थवादी और संवेदनशील चित्रण के लिए खूब सराही गईं।

1980 के दशक से उन्होंने चरित्र भूमिकाएं निभाना शुरू किया और उनका फिल्मी सफर ‘सनी’ (1984), ‘न्यू दिल्ली टाइम्स’ (1986), ‘स्वाति’ (1987), ‘मिसिसिपी मसाला’ (1991), ‘विरुद्ध’ (2005), और ‘एकलव्य: द रॉयल गार्ड’ (2007) जैसी फिल्मों के साथ जारी रहा। हिंदी के अलावा, उन्होंने कई यादगार बंगाली फिल्मों जैसे ‘शेष अंका’ (1963), ‘बरनाली’ (1963), ‘निर्जन सैकते’ (1965), ‘कलंकिनी कंकबती’ (1981), ‘प्रतिदान’ (1983), ‘अबर अरण्ये’ (2002), ‘शुभो मुहूर्त’ (2003), और ‘अंतहीन’ (2009) में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। फिल्मों के अलावा, शर्मिला ने ‘कथा सागर’ (1986), ‘रिश्ते’ (1994), और ‘ज़िंदगी’ (1999) जैसी टीवी सीरीज़ में भी काम किया। लंबे समय के बाद, 13 साल के अंतराल के बाद, उन्होंने 2023 में फिल्म ‘गुलमोहर’ से शानदार वापसी की, जिसके लिए उन्हें 2023 फिल्मफेयर ओटीटी अवॉर्ड्स में बेस्ट एक्ट्रेस क्रिटिक्स: वेब ओरिजिनल फिल्म का पुरस्कार मिला।

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व्यक्तिगत जीवन और परंपराओं को तोड़ती शख्सियत

1968 में शर्मिला टैगोर ने पटौदी परिवार के मशहूर क्रिकेटर मंसूर अली खान पटौदी, जिन्हें ‘टाइगर पटौदी’ के नाम से जाना जाता है, से शादी कर एक अंतर-धार्मिक विवाह की मिसाल कायम की। उनके तीन बच्चे हैं – अभिनेता सैफ अली खान, सोहा अली खान और सबा अली खान। उनकी पोती सारा अली खान और पोते इब्राहिम अली खान भी अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उस दौर में जब यह माना जाता था कि शादीशुदा हीरोइनों का करियर खत्म हो जाता है, शर्मिला टैगोर ने अपने करियर के शिखर पर शादी कर इस रूढ़िवादी सोच को तोड़ा। उन्होंने न केवल अपने सफल फिल्मी करियर को जारी रखा, बल्कि तीन बच्चों की मां होने के बावजूद एक शीर्ष अभिनेत्री के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखी। वे अपनी जोशीली और बेबाक शख्सियत के लिए जानी जाती थीं; 20 साल की उम्र में राजेश खन्ना की मां का किरदार निभाना हो या दो-पीस बिकिनी पहनकर फोटोशूट करवाना हो, उन्होंने हर बार अपनी शर्तों पर जीवन जिया और समाज की बंदिशों को चुनौती दी।

अभिनय से परे: सामाजिक योगदान और सम्मान

शर्मिला टैगोर का योगदान सिर्फ अभिनय तक ही सीमित नहीं रहा। अक्टूबर 2004 से मार्च 2011 तक उन्होंने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की अध्यक्ष के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दिसंबर 2005 में, उन्हें यूनिसेफ की सद्भावना दूत (Goodwill Ambassador) नियुक्त किया गया, जिसके माध्यम से उन्होंने सामाजिक कार्यों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की। 1999 में, फ्रांसीसी सरकार ने उन्हें कला और साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए ‘इंसिग्नेस डी कमांड्योर डी ऑर्ड्रे डेस आर्ट्स एट डेस लेट्रेस’ से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त, उन्हें 2012 में एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से कला के क्षेत्र में मानद डॉक्टरेट से भी नवाजा गया। शर्मिला टैगोर भारतीय सिनेमा की वो चमकती मिसाल हैं, जिनकी कला, साहस और सामाजिक प्रतिबद्धता ने अनगिनत लोगों को प्रेरित किया है।

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