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‘रंज ओ अलम’ से निकलीं DARBHANGA की रंजू…

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ह प्रेरणादायक सफल कहानी है। शीर्षक है रंजू देवी। सफलता। आत्मनिर्भरता। महिला सशक्तीकरण की जब भी बात होगी। रंजू के बिना अधूरी सी लगेगी। ‘Struggle To Success’|@ Manoranjan Thakur के साथ|

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साक्षात्…।।
“ओम जटा जूत समायुक्तमर्दहेन्दु कृत लक्षणम।
लोचनयात्रा संयुक्तम पद्मेन्दु सद्य शन नाम” ।

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काम और कार्य में बेहतर एकाग्रता का प्रतीक बनीं रंजू, आज महिला शक्ति को जीवंत बनातीं मिलती हैं। भुखमरी से आत्मनिर्भरता तक –मजदूरी से व्यवसाय तक! जानिए रंजू दीदी की कहानी। यह सफलता की कहानी मिसाल है। दरभंगा की दीदी कैसे बनीं मखाना-मछली व्यवसाय की क्विन। तालाब से तिगुनी कमाई! दरभंगा की रंजू देवी ने मखाना, सिंघाड़ा और मछली पालन से बदली किस्मत। रंजू दीदी की मेहनत देख आज सरकार भी हैरान है।

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Bullet Points):…औरत हूं मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूं, इक सच के तहफ़्फ़ुज़ के लिए सब से लड़ी हूं

दरभंगा की रंजू देवी…रंज औ अलम के संघर्षपूर्ण, प्रेरणादायक सफर का नाम है रंजू। यानि, रंज-ओ-ग़म दर्द-ओ-अलम ज़िल्लत-ओ-रुसवाई है, हम ने ये दिल के लगाने की सज़ा पाई है। ईंट-भट्टा मजदूर थी। पसीनें टपकते थे। आज, रंजू महिला उद्यमी कहलाती हैं। उनकी यह तीव्र, मेहनतकश यात्रा, हज़ार बर्क़ गिरे लाख आंधियां उट्ठें
वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं।

स्पष्ट, उत्कृष्ट, उत्तम, समग्र उदाहरण…

फिर क्या था, जीविका समूह और सरकारी योजना से मदद ने तालाब में मखाना, सिंघाड़ा और मछली के ऐसे पाजेब झंकृत किए तिगुनी आमदनी के सप्तक सुर में लहरी करने लगे। मात्र, ₹40,000 की पूंजी से शुरू हुआ व्यापार आज मासिक आय ₹10,000 तक पार कर चुका है। महिला सशक्तीकरण का स्पष्ट, उत्कृष्ट, उत्तम, समग्र उदाहरण…औरत हूं मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूं, इक सच के तहफ़्फ़ुज़ के लिए सब से लड़ी हूं।

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“मजदूरी से मखाना उद्योग तक: जीविका से जुड़कर रंजू देवी बनीं सफल उद्यमी | Bihar Makhana Farming Success Story”

रभंगा, देशज टाइम्स। जहां एक ओर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं आजीविका के लिए संघर्ष कर रही हैं, वहीं दरभंगा जिले के सारा मोहम्मदपुर गांव की रंजू देवी ने जीविका से जुड़कर अपनी किस्मत खुद लिखी है। कभी ईंट भट्ठे पर मजदूरी करने वाली रंजू देवी आज मखाना, सिंघाड़ा और मछली पालन के क्षेत्र में सफल महिला उद्यमी बन चुकी हैं।

साधारण जीवन, असाधारण संघर्ष

रंजू देवी के पति अमृत सहनी मजदूरी करते थे, जिससे घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल होता था, जिससे रंजू देवी भी पति के साथ मजदूरी करने लगीं। परिवार की दशा सुधारने के लिए उन्होंने कृष्णा जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ने का निर्णय किया।

जीविका से आत्मनिर्भरता की ओर

समूह से जुड़ने के बाद रंजू देवी ने हस्ताक्षर करना सीखा और समूह के अन्य क्रियाकलापों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगीं। उनके अंदर आत्मविश्वास और कार्य कुशलता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उन्हें पारंपरिक रूप से मखाना की खेती की जानकारी थी, लेकिन पूंजी की कमी के कारण वे इसे शुरू नहीं कर पा रही थीं।

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सरकारी योजना से मिली आर्थिक मदद

रंजू देवी ने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना के तहत आवेदन देकर 30,000 रुपए की बीज पूंजी प्राप्त की। साथ ही, सुहाग ग्राम संगठन से 10,000 रुपए अतिरिक्त सहयोग मिला। कुल 40,000 रुपए की सहायता से उन्होंने एक तालाब वार्षिक किराये पर लेकर मखाना की खेती शुरू की।

एक तालाब, तीन फसलें – तिगुना लाभ

मखाना की फसल के बाद रंजू देवी तालाब में सिंघाड़ा की खेती करती हैं। सिंघाड़ा की फसल निकालने के बाद उसी तालाब में मछली पालन करती हैं। वे रेहू, नैनी, बिकेट, सिल्वर और भाखुड़ जैसी मछलियों का पालन करती हैं। इसके साथ ही घोंघा और केकड़ा पालन भी कर रही हैं।

अब एक सफल महिला उद्यमी

मेहनत और लगन के बल पर रंजू देवी ने अपनी पहचान एसशक्त महिला उद्यमी के रूप में बना ली है। अब उनकी मासिक आय ₹7,000 से ₹10,000 के बीच हो गई है।

वे कहती हैं,

मेरे जीवन में जो बदलाव आया है, वो सब जीविका की ही देन है।

उनके साथ अब पूरा परिवार भी इस कार्य में हाथ बंटा रहा है।

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