जाले, दरभंगा। महाकवि कालिदास सूर्यदेव महाविद्यालय, त्रिमुहान चंदौना का 58वां स्थापना दिवस शुक्रवार को बड़े ही उत्साह और गरिमा के साथ मनाया गया। यह महाविद्यालय ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (LNMU) से संबद्ध है और पिछले पाँच दशकों से शिक्षा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दे रहा है।
कार्यक्रम का भव्य आयोजन
इस अवसर पर LNMU के लोकपाल प्रो. बैकुंठ पांडे, भू-संपदा पदाधिकारी डॉ. कामेश्वर पासवान, बी. आर. ए. विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. संजय कुमार, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना के प्राचार्य डॉ. दिव्यांशु कुमार, तथा आर.के. मिश्रा कॉलेज की सचिव सुचिता कुमारी सहित कई प्रतिष्ठित शिक्षाविद उपस्थित रहे।






कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सिद्धार्थ शंकर सिंह ने की। समारोह का शुभारंभ विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत स्वागत गान से हुआ, जिसने पूरे वातावरण को उल्लासमय बना दिया।
प्राचार्य का अभिवादन भाषण
प्राचार्य डॉ. सिद्धार्थ शंकर सिंह ने अपने संबोधन में अतिथियों का स्वागत करते हुए महाविद्यालय की गौरवशाली यात्रा को याद किया। उन्होंने स्व. कार्यानन्द शर्मा (महाविद्यालय के प्रथम प्राचार्य) के सपनों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
प्राचार्य ने बताया कि शीघ्र ही सनातकोत्तर (Postgraduate) स्तर की पढ़ाई आरंभ करने के लिए विश्वविद्यालय से अनुमति प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने यह भी घोषणा की कि पुरानी एस्बेस्टस भवन की जगह जल्द ही एक तीन मंजिला वर्ग कक्ष का निर्माण कराया जाएगा, जिससे छात्रों को आधुनिक और सुरक्षित अध्ययन सुविधा मिल सके।
महाविद्यालय का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. ममता पांडेय ने महाविद्यालय का संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि यह संस्था मूलतः त्रिमुहान गांव में स्व. सूर्यदेव ठाकुर और प्रथम प्रभारी प्राचार्य डॉ. अमरेंद्र मिश्र के प्रयासों से शुरू हुई थी।
इसके बाद वर्ष 1976 से चंदौना गांव में इसकी नींव मजबूत हुई, जिसमें स्व. जयनन्द मिश्र, स्व. वशिष्ठ नारायण ठाकुर, स्व. रामदौन सिंह, स्व. सुरेश ठाकुर और स्व. सुरेन्द्र ठाकुर समेत कई स्थानीय दानवीरों का योगदान अविस्मरणीय रहा।
अतिथियों के प्रेरणादायी विचार
डॉ. संजय कुमार ने प्रथम प्राचार्य स्व. कार्यानन्द शर्मा के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने न केवल महाविद्यालय बल्कि आसपास के गांवों में भी शिक्षा के महत्व को स्थापित किया।
डॉ. कामेश्वर पासवान ने महाविद्यालय की स्थापना काल की स्मृतियों को साझा किया। उन्होंने बताया कि उस समय केवल 120 विद्यार्थी और कुछ शिक्षक व शिक्षकेत्तर कर्मियों के सहयोग से यह यात्रा शुरू हुई थी।
डॉ. दिव्यांशु कुमार ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि 58 वर्षों बाद पहली बार स्थापना दिवस का आयोजन हुआ है, जिससे छात्रों, अभिभावकों और दानदाताओं में नई ऊर्जा का संचार हुआ है।
क्षेत्रीय शिक्षा जगत में नई ऊर्जा
इस समारोह ने न केवल महाविद्यालय परिवार को जोड़ा, बल्कि आसपास के गांवों और समाज में भी उत्साह और जागरूकता की नई लहर पैदा की। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे आयोजन से छात्रों में शैक्षिक आत्मविश्वास (Educational Confidence) और अभिभावकों में उच्च शिक्षा के प्रति विश्वास (Trust in Higher Education) बढ़ता है।
महाविद्यालय के विकास कार्य और विस्तार योजनाएँ यह दर्शाती हैं कि आने वाले समय में यह संस्थान बिहार में उच्च शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरेगा।
शिक्षा ही विकास की कुंजी
महाकवि कालिदास सूर्यदेव महाविद्यालय का 58वां स्थापना दिवस न केवल एक औपचारिक आयोजन था, बल्कि यह संस्था की गौरवपूर्ण परंपरा, भविष्य की योजनाओं और शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक बना।
स्थापना दिवस पर हुए इस समारोह ने स्पष्ट संदेश दिया कि शिक्षा ही विकास की कुंजी है और मिथिला क्षेत्र में इस महाविद्यालय की भूमिका आने वाले वर्षों में और भी अधिक सशक्त होगी।








