Makar Sankranti: प्रत्येक वर्ष जब सूर्य उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब प्रकृति और मानव मन दोनों ही एक नए उत्साह और ऊर्जा से भर उठते हैं। यह केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में गहरे से निहित एक महापर्व है, जो दान, स्नान और पुण्य कर्मों के महत्व को दर्शाता है।
मकर संक्रांति: जानिए इस महापर्व की पौराणिक कथा और आध्यात्मिक महत्व
शीत ऋतु की विदाई और वसंत के आगमन का संकेत देता यह पर्व, नई फसल, सुख-समृद्धि और जीवन में सकारात्मक बदलावों का प्रतीक है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है, किंतु इसका मूल भाव एक ही है – सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और प्रकृति के चक्र का सम्मान करना। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने, तिल-गुड़ का दान करने और पतंग उड़ाने की परंपरा सदियों पुरानी है। इस पावन अवसर पर, आइए जानते हैं कि इस महापर्व का आरंभ कैसे हुआ और इसकी पौराणिक कथाएं क्या हैं। धर्म, व्रत और त्योहारों की संपूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें
मकर संक्रांति क्यों है इतना खास?
मकर संक्रांति से जुड़ी पौराणिक कथाएं
मकर संक्रांति के पर्व से कई प्राचीन और महत्वपूर्ण कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो इसके आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को और बढ़ा देती हैं।
- सूर्य देव और शनि देव की कथा: पौराणिक कथाओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि देव से मिलने उनके घर जाते हैं। चूंकि शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिए इस दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश पिता-पुत्र के मिलन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन तिल का विशेष महत्व है क्योंकि शनि देव को तिल अत्यंत प्रिय हैं। यह दिन पिता-पुत्र के संबंधों में मधुरता लाने और वैमनस्य को दूर करने का संदेश देता है।
- गंगा अवतरण की कथा: एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, इसी दिन महाराज भागीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए कठोर तपस्या करके मां गंगा को पृथ्वी पर अवतरित कराया था। गंगा, कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में जा मिली थीं, जहां भागीरथ के पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त हुआ। यही कारण है कि इस दिन गंगा स्नान और दान का विशेष पुण्य माना जाता है।
- भीष्म पितामह और शरशय्या: महाभारत काल में भीष्म पितामह ने शरशय्या पर लेटे हुए, अपनी इच्छा से प्राण त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन का ही चुनाव किया था। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनके प्राण उत्तरायण काल में ही निकलें, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि उत्तरायण में देह त्यागने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है और वह पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।
- भगवान विष्णु और असुरों का संहार: कुछ मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने असुरों का संहार कर उनके सिरों को मंदरा पर्वत में दबाया था। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी है।
मकर संक्रांति पूजा विधि और महत्व
मकर संक्रांति के दिन कुछ विशेष कर्म करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है।
- पवित्र स्नान: इस दिन किसी पवित्र नदी, विशेषकर गंगा, यमुना या अन्य पावन धाराओं में स्नान करने का अत्यधिक महत्व है। यदि नदी में स्नान संभव न हो तो घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है।
- सूर्य देव की उपासना: स्नान के पश्चात्, सूर्य देव को अर्घ्य दें। उन्हें जल में रोली, अक्षत और लाल पुष्प मिलाकर अर्पित करें।
- दान-पुण्य: इस दिन तिल, गुड़, कंबल, खिचड़ी, वस्त्र, अन्न आदि का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। विशेष रूप से तिल का दान करने से शनि दोष से मुक्ति मिलती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
- पतंग उड़ाना: पतंग उड़ाना इस पर्व का एक अभिन्न हिस्सा है, जो उल्लास और उमंग का प्रतीक है।
- खिचड़ी सेवन: कई स्थानों पर इस दिन खिचड़ी बनाने और खाने की परंपरा है, इसलिए इसे “खिचड़ी पर्व” भी कहते हैं।
मकर संक्रांति 2024: शुभ मुहूर्त
| कर्म | समय सीमा |
|---|---|
| संक्रांति काल | 15 जनवरी 2024, प्रातः 02 बजकर 54 मिनट |
| पुण्यकाल | 15 जनवरी 2024, प्रातः 07 बजकर 15 मिनट से दोपहर 12 बजकर 30 मिनट तक |
| महापुण्यकाल | 15 जनवरी 2024, प्रातः 07 बजकर 15 मिनट से प्रातः 09 बजकर 00 मिनट तक |
मंत्र
मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव के इन मंत्रों का जाप करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः।
ॐ घृणि सूर्याय नमः।
उपाय और निष्कर्ष
मकर संक्रांति का पर्व हमें यह सिखाता है कि हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करना चाहिए और दान-पुण्य के माध्यम से समाज में सद्भाव फैलाना चाहिए। यह दिन आध्यात्मिक उन्नति, शारीरिक स्वास्थ्य और भौतिक समृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन किए गए छोटे से छोटे पुण्य कर्म का फल भी कई गुना होकर वापस लौटता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह पर्व हमें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने और जीवन में सकारात्मकता लाने के लिए प्रेरित करता है।







