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बारिश नहीं, बिजली गुल! फिर भी रातभर जागकर धान रोप रहे दरभंगा के किसान, जानें क्यों?

Darbhanga News: जाले प्रखंड के किसान आद्रा नक्षत्र खत्म होने से पहले रोपनी पूरी करने की चुनौती से जूझ रहे हैं। बिजली कटौती और सूखे के बावजूद उनकी मेहनत जारी है।

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Darbhanga News: कम बारिश के कारण दरभंगा जिले के जाले प्रखंड में किसान निजी नलकूपों के भरोसे धान की रोपनी कर रहे हैं। मानसून की बेरुखी के बीच, बिजली की अनियमित आपूर्ति जैसी बाधाओं के बावजूद वे रात-दिन खेतों में जुटे हुए हैं। किसानों के सामने आद्रा नक्षत्र समाप्त होने से पहले रोपनी का काम पूरा करने की बड़ी चुनौती है।

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किसान रात भर खेतों में पानी भरते हैं और सुबह होते ही मजदूरों को बुलाकर नर्सरी से धान की पौध उखड़वाकर रोपनी शुरू कराते हैं। ट्रैक्टर से खेतों की कदवा (जुताई) भी की जा रही है। उनका मानना है कि ताज़ी कदवा होने पर रोपनी के बाद पानी में घुली मिट्टी पौधों की जड़ों में अच्छी तरह बैठ जाती है, जिससे तेज हवा चलने पर पौधे उखड़ते नहीं हैं। बासी कदवा होने पर मजदूरों से अधिक गहराई में रोपनी करानी पड़ती है, जो अधिक श्रमसाध्य होता है।

बिजली की आंख-मिचौली से पटवन प्रभावित

राम कुमार शाही, रतनपुर निवासी किसान और सीआरपीएफ जवान, ने बताया, “पूर्वजों के समय से आद्रा नक्षत्र में धान रोपनी की परंपरा रही है। इसी कारण मैं विशेष अवकाश लेकर गांव आया हूं और नक्षत्र समाप्त होने से पहले रोपनी का कार्य पूरा कर पुनः ड्यूटी पर लौट जाऊंगा। सनहपुर पावर सब स्टेशन की जर्जर विद्युत व्यवस्था के कारण लगातार चार से पांच घंटे भी निर्बाध बिजली नहीं मिल रही है। हर तीन-चार घंटे पर आधे से एक घंटे तक आपूर्ति बाधित हो जाती है, जिससे पटवन प्रभावित हो रहा है और रोपनी का कार्य अपेक्षित गति से नहीं हो पा रहा है।”

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रतनपुर गांव में राज सिंघानिया, सुमन कुमार झा, कन्हैया झा, चंद्र मोहन झा और शेष नारायण झा समेत कई किसान अपने खेतों में रोपनी और पटवन की व्यवस्था में लगे हुए हैं। कई किसान अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, जबकि अन्य ट्रैक्टर से कदवा कराने में व्यस्त थे। बिजली की यह अनियमितता धान की खेती के लिए चुनौती बनी हुई है।

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कम उपज में भी राजेंद्र स्वेता और मंसूरी का भरोसा

किसानों ने बताया कि क्षेत्र में घरेलू उपभोग के लिए मुख्य रूप से राजेंद्र स्वेता और कतरनी किस्म की खेती की जाती है। वहीं, बाजार में बिक्री के लिए राजेंद्र मंसूरी किस्म को अधिक पसंद किया जाता है। किसानों के अनुसार, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी राजेंद्र स्वेता की उपज 60 से 70 किलो प्रति कट्ठा और राजेंद्र मंसूरी की उपज 70 से 80 किलो प्रति कट्ठा तक हो जाती है।

किसानों का कहना है, “भले ही बारिश कम हो, लेकिन हम अपनी मेहनत से अच्छी उपज प्राप्त करने की पूरी कोशिश करते हैं।”

यह स्थिति दर्शाती है कि दरभंगा के किसान विपरीत मौसम और बुनियादी सुविधाओं की कमी के बावजूद अपनी पारंपरिक खेती को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। आद्रा नक्षत्र की समाप्ति से पहले रोपनी पूरी करना उनके लिए एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है, जिसके लिए वे निरंतर संघर्ष कर रहे हैं।

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