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बड़ी खबर Bihar Railway News ! बिहार में अब 13 साल में ही हटेंगे पुराने कोच, आपकी यात्रा होगी बेहद आरामदायक और सुरक्षित | पढ़िए – 350 करोड़ और 170 हाइब्रिड कोच

Bihar Railway News: रेलवे बोर्ड के ऐतिहासिक फैसले से बिहार के लाखों यात्रियों को सीधा लाभ मिलेगा। पुराने हाइब्रिड और पारंपरिक कोचों को 13 साल में ही हटाया जा सकेगा, जिससे लूप लाइनें खाली होंगी और आधुनिक, सुरक्षित ट्रेनों का संचालन बढ़ेगा।

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Bihar Railway News: पटना और बिहार के लाखों रेल यात्रियों के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। भारतीय रेलवे बोर्ड ने पारंपरिक और हाइब्रिड श्रेणी के कोचों को कंडम घोषित करने के नियमों में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है। इस नए नियम के तहत, जोनल रेलवे के मुख्य यांत्रिक इंजीनियरों को अब 13 साल पूरे कर चुके पारंपरिक और हाइब्रिड कोचों को उनकी आवश्यकता के आधार पर कंडम घोषित करने का अधिकार मिल गया है। पूर्व में इन रेल डिब्बों की निर्धारित सेवा अवधि 20 वर्ष हुआ करती थी।

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इस अहम निर्णय से पुराने और अनुपयोगी कोचों को हटाकर, अधिक आधुनिक और सुरक्षित रेल डिब्बों का संचालन बढ़ाया जा सकेगा। यह कदम यात्रियों के लिए सफर को पहले से कहीं अधिक सुविधाजनक और सुरक्षित बनाएगा।

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यात्रियों को मिलेगी आधुनिक और सुरक्षित यात्रा

रेलवे बोर्ड के इस फैसले का सीधा लाभ यात्रियों को मिलेगा। दानापुर मंडल सहित पूर्व मध्य रेलवे के विभिन्न रेल मार्गों पर अब पुराने कोचों को चरणबद्ध तरीके से हटाकर उनकी जगह नई और अत्याधुनिक बोगियां लगाई जाएंगी। रेलवे अधिकारियों के अनुसार, नई पीढ़ी की एलएचबी (Linke Hofmann Busch) और पुश-पुल तकनीक वाली बोगियां सुरक्षा मानकों पर बेहतर हैं। ये कोच यात्रियों को अधिक आराम और आधुनिक सुविधाएं प्रदान करते हैं, जिससे उनका सफर पहले की तुलना में कहीं अधिक आरामदायक होगा।

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350 करोड़ के 170 हाइब्रिड कोच वर्षों से बेकार

रेलवे सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, पूर्व मध्य रेलवे के पांचों मंडलों में लगभग 170 हाइब्रिड कोच कई वर्षों से उपयोग से बाहर पड़े हैं। इन कोचों की अनुमानित कीमत लगभग 350 करोड़ रुपये आंकी गई है। इन बोगियों को न तो ट्रेन संचालन में शामिल किया जा सकता था और न ही इनकी 20 साल की निर्धारित समयसीमा पूरी न होने के कारण इन्हें कंडम घोषित किया जा सकता था। इन बेकार पड़े कोचों के कारण कई रेलवे स्टेशनों की लूप लाइनें भी लंबे समय से व्यस्त थीं, जिससे ट्रेनों के परिचालन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था।

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जोड़न अधिकारियों को मिला विशेष अधिकार

विभिन्न रेलवे जोनों ने इस गंभीर समस्या को लेकर रेलवे बोर्ड से मार्गदर्शन मांगा था। इस आग्रह के बाद, बोर्ड ने सभी जोनल रेलवे के मुख्य यांत्रिक इंजीनियरों को 13 वर्ष पूरे कर चुके पारंपरिक और हाइब्रिड कोचों को आवश्यकतानुसार कंडम घोषित करने का अधिकार दे दिया है। इस बदलाव से पुराने कोचों को हटाने और नए, आधुनिक कोचों को सेवा में लाने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

2008-09 में हुई थी हाइब्रिड कोचों की शुरुआत

रेलवे विशेषज्ञों के अनुसार, वर्ष 2008-09 में जर्मन तकनीक पर आधारित हाइब्रिड कोचों को भारतीय रेलवे के बेड़े में शामिल किया गया था। उस समय प्रत्येक कोच की लागत लगभग दो करोड़ रुपये थी। शुरुआती वर्षों में इन कोचों का प्रदर्शन संतोषजनक रहा, लेकिन बाद में छोटे-छोटे तकनीकी पुर्जों में खराबी आने के कारण कई कोच धीरे-धीरे संचालन से बाहर होते चले गए। वर्ष 2019 तक, बड़ी संख्या में ये कोच बेकार हो गए और उन्हें विभिन्न स्टेशनों की लूप लाइनों पर खड़ा कर दिया गया।

भारतीय रेलवे में समय-समय पर अलग-अलग तकनीक के कोच शामिल किए गए हैं:

  • आईसीएफ कोच: वर्ष 2008 तक मुख्य रूप से लाल रंग के पारंपरिक आईसीएफ (Integral Coach Factory) कोच संचालित होते थे।
  • हाइब्रिड कोच: वर्ष 2009 से 2014 के बीच इनका संचालन शुरू हुआ, लेकिन वर्ष 2019 के बाद इनका उपयोग लगभग बंद हो गया।
  • एलएचबी कोच: वर्ष 2015 से इनका विस्तार हुआ और वर्तमान में पूर्व मध्य रेलवे की लगभग 98 प्रतिशत ट्रेनें एलएचबी कोच से संचालित हो रही हैं।
  • पुश-पुल कोच: वर्ष 2022 से वंदे भारत, अमृत भारत और स्लीपर वंदे भारत जैसी अत्याधुनिक ट्रेनों में इन उन्नत कोचों का उपयोग किया जा रहा है। ये सुरक्षा और आराम के लिहाज से सबसे आधुनिक माने जाते हैं।
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यह निर्णय न केवल यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा बढ़ाएगा, बल्कि भारतीय रेलवे के परिचालन दक्षता में भी सुधार लाएगा। पुराने कोचों के हटने से लूप लाइनें खाली होंगी, जिससे ट्रेनों की आवाजाही सुचारू हो सकेगी और बिहार सहित पूरे देश में रेल यात्रा का अनुभव और बेहतर होगा।

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