Bihar Court Fraud: बिहार की न्यायिक व्यवस्था को हिला देने वाले एक बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा दरभंगा में हुआ है। फर्जी पहचान पत्र के सहारे खुद को एमटीएस (मल्टी टास्किंग स्टाफ) बताकर प्रशिक्षण ले रहे दो युवकों को लहेरियासराय पुलिस ने गिरफ्तार किया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इन कथित MTS कर्मियों को एक अपर लोक अभियोजक (APP) अदालत परिसर में ही प्रशिक्षण दे रहे थे। इस बिहार कोर्ट फ्रॉड मामले में APP समेत कुल तीन लोगों को गिरफ्तार कर मंगलवार को CJM न्यायालय में पेश किया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने दोनों कथित एमटीएस आरोपियों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है। वहीं, प्रशिक्षण देने वाले APP अशोक कुमार को सात दिनों की औपबंधिक जमानत प्रदान कर मुक्त कर दिया गया। इस घटना ने न्यायिक प्रक्रिया की गोपनीयता और संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।






फर्जी MTS और APP की भूमिका पर गंभीर सवाल
गिरफ्तार किए गए फर्जी एमटीएस युवकों की पहचान बहेड़ी थानाक्षेत्र के तुर्की निवासी दामोदर यादव के पुत्र विकास कुमार यादव और सदर थानाक्षेत्र के तेलहन लक्ष्मीपुर गांव के रामदास यादव के पुत्र मनोज कुमार के रूप में हुई है। पुलिसिया पूछताछ में इन दोनों ने स्वीकार किया कि वे 24 जून 2024 से विभिन्न अदालतों में एमटीएस के तौर पर प्रशिक्षण ले रहे थे। उनके पास से सिविल कोर्ट दरभंगा के नाम से जारी एक पहचान पत्र भी बरामद हुआ, जिस पर ‘इंचार्ज रजिस्ट्रार’ की मुहर और ‘डीएलएसए’ सचिव आरती कुमारी के फर्जी हस्ताक्षर थे।
पुलिस के सत्यापन में यह पहचान पत्र फर्जी पाया गया, क्योंकि सिविल कोर्ट में ‘इंचार्ज रजिस्ट्रार’ जैसा कोई पद मौजूद ही नहीं है। इस खुलासे के बाद पुलिस को एक बड़े संगठित गिरोह के सक्रिय होने की आशंका है, जो नौकरी दिलाने के नाम पर इस तरह के फर्जीवाड़े को अंजाम दे रहा है। पुलिस ने इस पूरे प्रकरण की सूक्ष्म और वैज्ञानिक जांच शुरू कर दी है।
अदालती गोपनीयता भंग करने का गंभीर आरोप
इस पूरे मामले में न्याय के मंदिर में जिला के एक अपर लोक अभियोजक द्वारा बिना कागजातों और नियुक्ति पत्र देखे, बिना आई कार्ड का सत्यापन किए ही अज्ञात के कहने पर न्यायालय प्रकोष्ठ में प्रशिक्षण देने की बात गंभीर लापरवाही का द्योतक मानी जा रही है।
लहेरियासराय थाना में इस संबंध में कांड संख्या 450/26 दर्ज किया गया है। इसमें गिरफ्तार तीनों के अलावा नौकरी दिलाने का झांसा देने वाले गिरोह के सदस्य देव, नईमुद्दीन, अजय उर्फ अमन और फर्जी आईकार्ड बनाने वाले दुकानदार समेत अन्य अज्ञात लोगों को भी आरोपी बनाया गया है। प्राथमिकी में सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की कई गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। इन धाराओं में न्यायालय के विचारण, कागजातों की गोपनीयता, संवेदनशीलता भंग एवं दुरुपयोग करने, गंभीर कांडों के अभियुक्तों को लाभ पहुंचाने और अवैध रूप से लाभ लेने के गंभीर आरोप शामिल हैं।
न्यायिक सुरक्षा पर मंडराया खतरा
दरभंगा कोर्ट में सामने आए इस फर्जीवाड़े ने न्यायिक सुरक्षा और ईमानदारी पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। एक अपर लोक अभियोजक का बिना उचित सत्यापन के फर्जी कर्मियों को प्रशिक्षण देना, संगठित अपराध के संकेत दे रहा है। पुलिस अब इस पूरे रैकेट की जड़ तक पहुंचने की कोशिश कर रही है ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके और न्यायपालिका की गरिमा व गोपनीयता को सुरक्षित रखा जा सके। यह घटना दर्शाती है कि सरकारी नौकरियों के नाम पर ठगी का जाल कितना गहरा हो चुका है और इसमें किस हद तक अंदरूनी लोग भी शामिल हो सकते हैं।








