Bihar Dalit Politics: बिहार में दलित राजनीति का पारा चढ़ा हुआ है। राज्य के दो प्रमुख दलित नेता, बिहार सरकार में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान, कई मुद्दों पर आमने-सामने खड़े हैं। आरक्षण में ‘कोटे के अंदर कोटा’ यानी उप-वर्गीकरण को लेकर पिछले महीने हुई बहस के बाद, दोनों नेताओं के बीच टकराव एक बार फिर गहरा गया है। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हस्तक्षेप से यह विवाद फिलहाल शांत हो गया है, लेकिन यह घटनाक्रम बिहार के दलित नेतृत्व पर वर्चस्व की लड़ाई को स्पष्ट करता है।
आरक्षण के ‘उप-वर्गीकरण’ पर अलग-अलग राय
केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी, जो मुसहर समुदाय से आते हैं, लंबे समय से अनुसूचित जाति (SC) समुदाय के भीतर सबसे वंचित वर्गों के लिए अलग उप-कोटा की मांग कर रहे हैं। उनके बेटे और बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन ने भी आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनका तर्क है कि आजादी के लगभग आठ दशक बाद यह जानना ज़रूरी है कि आरक्षण का लाभ किन वर्गों तक पहुंचा है और कौन से वर्ग अभी भी इससे वंचित हैं। मांझी और सुमन का कहना है कि वे आरक्षण के विरोधी नहीं हैं, बल्कि उनका उद्देश्य आरक्षण का दायरा बढ़ाना या उन वर्गों के लिए अलग व्यवस्था करना है जिन्हें इसका पर्याप्त लाभ नहीं मिला है।
जीतन राम मांझी और संतोष सुमन का कहना है कि वे आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। उनका जोर या तो आरक्षण का दायरा बढ़ाने या उन वर्गों के लिए अलग व्यवस्था करने पर है, जिन्हें अब तक इसका पर्याप्त लाभ नहीं मिला है।
दूसरी ओर, चिराग पासवान ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ का प्रावधान लागू करने का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि आरक्षण आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव, बहिष्कार और छुआछूत जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए दिया गया है। इसी मुद्दे पर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के साथ उनके बेटे संतोष सुमन के बीच तीखा मतभेद सामने आया। बीजेपी ने इस संवेदनशील मुद्दे पर सीधे तौर पर किसी एक पक्ष का समर्थन करने से रणनीतिक दूरी बनाए रखी है।
भरत तिवारी एनकाउंटर और दलित नेतृत्व का संघर्ष
हाल ही में भोजपुर जिले में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में भी दोनों नेताओं की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। चिराग पासवान ने बिहार की BJP सरकार पर दबाव बनाने की बात कही, ताकि एनकाउंटर में शामिल पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सके। इसके विपरीत, जीतन राम मांझी ने पुलिस की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि 28 वर्षीय भरत तिवारी के पास बिना लाइसेंस का हथियार था और पुलिस की कार्रवाई पूरी तरह से सही थी। खुद को सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता बताने वाले तिवारी 17 जून को पुलिस के साथ तीखी बहस के बाद हुई कार्रवाई में मारे गए थे।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और रोहिणी आयोग की भूमिका
इस विवाद की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का अगस्त 2024 का एक महत्वपूर्ण फैसला है। छह-एक के बहुमत वाले इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति दी थी। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन तथा सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व के आधार पर अनुसूचित जातियों के भीतर अधिक वंचित वर्गों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाना था। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के भीतर ‘क्रीमी लेयर’ की पहचान के लिए उचित मानदंड तैयार करने पर भी विचार करने को कहा था।
इस फैसले ने 2004 के ईवी चिन्नैया मामले में पांच जजों की संविधान पीठ के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जातियों को एक समरूप समूह माना जाता है और राज्यों को उनके भीतर उप-वर्गीकरण करने का अधिकार नहीं है।
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के भीतर आरक्षण के लाभों के असमान वितरण की जांच के लिए केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2017 में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) जी. रोहिणी की अध्यक्षता में एक चार सदस्यीय आयोग का गठन किया था। इस आयोग का उद्देश्य OBC के भीतर उप-वर्गीकरण के लिए वैज्ञानिक आधार, मानदंड और तंत्र तैयार करना था। आयोग ने 21 जुलाई 2023 को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी थी, हालांकि यह रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है।
तेजस्वी यादव का बीजेपी पर आरोप
बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर बीजेपी पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी पर्दे के पीछे से इस विवाद को हवा दे रही है, ताकि लोगों का मूड भांपा जा सके। तेजस्वी ने जीतन राम मांझी और चिराग पासवान को राजनीतिक ‘किरदार’ बताते हुए कहा कि उनका ध्यान पद और सत्ता पर अधिक है, जबकि समाज के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट गए हैं।
तेजस्वी यादव ने कहा, ‘बीजेपी पर्दे के पीछे से इस पूरे घटनाक्रम को हवा दे रही है। बीजेपी लोगों का मूड भांपने के लिए इस तरह की बहस को सामने ला रही है। मांझी और पासवान राजनीतिक ‘किरदार’ हैं, उनका ध्यान पद और सत्ता पर ज्यादा है, जबकि समाज के मुद्दे पीछे छूट गए हैं।’
यह स्पष्ट है कि बिहार में दलित नेतृत्व की यह जंग केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का परिणाम नहीं है, बल्कि यह आरक्षण नीति के भविष्य और सामाजिक न्याय की जटिलताओं को भी दर्शाती है। आने वाले समय में यह टकराव राज्य की राजनीति में और अधिक उबाल ला सकता है।







