जाम का दर्शन दिव्य है साहेब हमारी सड़कों पर। जाम में फ़ंसा हुआ आदमी कोलंबस हो जाता है। वह दाएं-बांएं,आगे-पीछे, अगल-बगल से होकर जाम से निकल भागना चाहता है। जाम में फ़ंसा हुआ हर व्यक्ति मुक्ति का अमेरिका पाना चाहता है, लेकिन जाम उसे और फ़ंसा देता है। वापस भारत में पटक देता है। हर गलत साइड से निकलता आदमी दूसरे को रांग साइड चलने के लिए टोंकता है। हर चालक आपसे जरा सा साइड देने की बात करता है। साहेब मत पूछिए जितने भी साहेब आए जाम को कम करने की बात करते चले गए मगर आज भी वह गीत हमको याद खासकर यह गीत अगर आज के समय में दोबारा लिखे जाते तो उनमें जाम जरूर शामिल होता, दादा कहिन, हम तुम्हे चाहते हैं ऐसे, मरने वाला कोई जिंदगी चाहता हो जैसे अगर आज लिखा तो शायद लिखा जाता तो शायद इस तरह बनता, हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे, जाम में फ़ंसा कोई उससे निकलना चाहता हो जैसे मरने का अनुभव हरेक को नहीं होता। लेकिन जाम के अनुभव की बात से यह गाना ज्यादा अपीलिंग होता। ज्यादा लोगों तक पहुंचता। सड़कों में जाम लगने के कारण मांग व आपूर्ति वाले घराने के हैं। गाड़ियां ज्यादा सड़कें कम। ज्यादा समय नहीं लगेगा जब शहरों में गाड़ियों का कुल क्षेत्रफ़ल शायद शहरों की सड़कों के क्षेत्रफ़ल से आगे निकल जाए। सड़कें का कुल क्षेत्रफ़ल कम गाड़ियों का ज्यादा। आज भी गाड़ी बेचने वाली कंपनियां तमाम तरह के आफ़र दे रही हैं। कल को शायद वे गाड़ी बेंचने के लिए गाड़ी के साथ एकाध किलोमीटर सड़क भी उपहार में दे यही तो है दिमाग का जाम जो सांस फुलाए बैठा है शहर की हर सड़क हर गली में जहां जाम ही जाम है और हम आप हैं।









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