चुनाव डेस्क, देशज टाइम्स। बिहार कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। कांग्रेस ने यहां कई सालों तक राज किया। कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की यहां तूती बोलती थी लेकिन आज हश्र यह कि कांग्रेस एक एक सीट के लिए राजद के सामने गिड़गिड़ाती दिख रही है। अपने सबसे बुरे दौर में चल रही कांग्रेस को अगर प्राश्यचित करने को कहा जाए तो उसकी हालिया एक गलती उसे इस दुर्दशा तक पहुंचाने को जिम्मेदार है।
अगर उस गलती से कांग्रेस बचती तो आज 1996 केबादराजदव बीच में जदयू गठबंधन केसहारेचलरहीपार्टीआज आत्मसम्मान से सिर उठाकर बात करती और उसका खामियाजा आज पार्टी को अपने दुर्दिन से बेहतर स्थिति में बाहर निकाल सकता था। सहयोगीदलोंके सामने आज कांग्रेस आत्मसमर्पण करती नहीं दिखती। अगर कांग्रेस एक वो भूल नहीं करती जिसका जिक्र हम खबर में करने जा रहे हैं तो आज कांग्रेस के हाथ से दरभंगा, मधुबनी, शिवहर, औरंगाबाद की सीट पर अपने ही वफादार साथियों की किरकिरी होने का दिन नहीं देखती।
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आज दरभंगा से कीर्ति आजाद चुनाव लड़ रहे होते तो मधुबनी से शकील अहमद वहीं शिवहर से लवली आनंद या फिर औरगाबाद से निखिल कुमार भाग्य आजमाते दिखते। औरंगाबाद के साथ दरभंगा व मधुबनी भीकांग्रेस का कभी गढ़ था।1950 चुनावके बाद औरंगाबादसे कांग्रेस ही सबसे पहले लड़ने वालों में रही है। यहां से नौबारसत्येंद्रनारायणसिन्हा,
उनकेपरिजन या फिरआज बेटिकटहुएनिखिलकुमारचुनाव लड़ चुके हैं। फिलहाल महागठबंधनमेंवह नौ सीटों पर सिमटी है जिसमें से तीन सीट पर जीत की उम्मीद है। दरभंगा से कांग्रेस ने कीर्ति आजाद को खो दिया है। मधुबनी से शकील का पत्ता साफ है। निखिल भी हम के चक्कर में अपने समर्थकों के साथ निराश हैं। कांग्रेस के पास आज सिर्फनौसीटेंहैं। एकराज्यसभाकीसीट है उसपर कौन जाएगा। कई नाम उसके साथ दावेदार हैं। हालात यह है कि बिहार में कांग्रेस के पास जनाधार खत्म हो चुका है। कोई भी नेता नहीं है।
हां, शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आजाद इसबार आए हैं। प्रियंका भी चुनाव प्रचार करेंगी तो शायद आगे मौसम बदल जाए लेकिन अब बात करते हैं उस गलती की जिससे आज कांग्रेस बैकफुट पर है। याद कीजिए जब तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री थे। उनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। नीतीश कुमार ने उनसे जवाब मांगा उन्होंने डिप्टी सीएम की कुर्सी छोड़ने से इनकार कर
दिया और फिर नीतीश राहुल के दरबार में पहुंचे बस यही गलती आज भोग रही है कांग्रेस अगर उस दिन राहुल या कांग्रेस नीतीश की बात मानकर लालू का साथ छोड़ देते। नीतीश का साथ देते तो आज नीतीश और कांग्रेस साथ मिलकर लड़ रहे होते और कांग्रेस को लालू परिवार का यह ड्रामा देखने को नहीं मिलता। जनाधार भी बढ़ता और सीटें भी दिल्ली की जंग में आसानी होती।अगर कांग्रेस नीतीश की बात मान ली होती बिहार में नीतीश के साथ आज सरकार होती। अशोक भी नहीं छोड़ते। मोदी की हेकड़ी नहीं दिखती और बिहार बमबम करता साफ कहता हम बनाएंगें केंद्र में सरकार लेकिन ऐसा हुआ नहीं बस एक गलती का खामियाजा भुगत रहे कीर्ति, शकील, निखिल, लवली…।
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