Munger Banyan Tree: बिहार के मुंगेर में स्थित एक विशाल बरगद के पेड़ ने अब वैज्ञानिक रूप से दुनिया के सबसे पुराने और सटीक उम्र वाले बरगद का दर्जा हासिल कर लिया है. वैज्ञानिकों ने उच्च-सटीकता वाली रेडियोकार्बन डेटिंग के जरिए इस अद्भुत वृक्ष की न्यूनतम उम्र करीब 700 साल निर्धारित की है. यह शोध ‘Quaternary Research’ नामक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित हुआ है, जिसके बाद इस बरगद ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है.
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस के माध्यम से यह अध्ययन 23 अप्रैल 2026 को ऑनलाइन प्रकाशित हुआ था. भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने भी 3 जुलाई 2026 को इस महत्वपूर्ण उपलब्धि की जानकारी साझा की, जिससे इसकी प्रामाणिकता और बढ़ गई है. मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि मुंगेर के इस बिहार के बरगद की उम्र का निर्धारण केवल ऐतिहासिक रिकॉर्ड या स्थानीय लोककथाओं के आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रेडियोकार्बन डेटिंग विधि से किया गया है.
वैज्ञानिक जांच से सामने आई 700 साल की सच्चाई
यह विशाल बरगद मुंगेर स्थित इंडियन टोबैको कंपनी के परिसर में मौजूद है. शोधकर्ताओं ने इस पेड़ की उम्र जानने के लिए विशेष तरीके अपनाए. उन्होंने पेड़ के एक खुले हुए द्वितीयक तने और एक पुरानी मुख्य शाखा के सबसे अंदरूनी हिस्से, जिसे पिथ कहा जाता है, से नमूने एकत्रित किए. इन नमूनों की रेडियोकार्बन जांच में क्रमशः 276±36 वर्ष BP और 652±37 वर्ष BP की आयु सामने आई.
वैज्ञानिकों ने इन परिणामों और आधुनिक कैलिब्रेशन तकनीकों के आधार पर इस मुंगेर के बरगद की न्यूनतम रेडियोकार्बन उम्र लगभग 700 वर्ष तय की है. ‘न्यूनतम उम्र’ का अर्थ यह है कि जांच किए गए पेड़ के हिस्से कम से कम इतने पुराने हैं, इसलिए पेड़ की वास्तविक उम्र 700 साल या उससे भी अधिक हो सकती है.
उष्णकटिबंधीय पेड़ों की उम्र मापना क्यों है मुश्किल?
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले पेड़ों की उम्र का निर्धारण करना वैज्ञानिकों के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है. समशीतोष्ण क्षेत्रों के पेड़ों में हर साल बनने वाले स्पष्ट ग्रोथ रिंग्स होते हैं, जिनसे उनकी उम्र का आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है. लेकिन बरगद जैसे उष्णकटिबंधीय पेड़ों में ऐसे वार्षिक छल्ले सामान्य तौर पर नहीं मिलते, जिससे उम्र का आकलन कठिन हो जाता है.
बरगद की जटिल संरचना भी इस प्रक्रिया को और मुश्किल बनाती है. इसमें एक मुख्य तने के अलावा बड़ी संख्या में द्वितीयक तने और जड़ें विकसित हो जाती हैं. ऐसे में किसी एक तने की उम्र को पूरे पेड़ की उम्र मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होता. मुंगेर के इस बरगद पर किए गए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इसी चुनौती से निपटने के लिए लकड़ी के पिथ के बेहद सटीक हिस्से को लक्षित किया. इसके बाद लकड़ी से अल्फा-सेल्यूलोज निकालकर AMS (Accelerator Mass Spectrometry) रेडियोकार्बन डेटिंग की गई और आधुनिक कैलिब्रेशन तकनीकों का इस्तेमाल किया गया.
केवल एक पेड़ नहीं, पूरा पारिस्थितिकी तंत्र
बरगद जैसे विशाल और प्राचीन पेड़ों का महत्व केवल उनकी उम्र या सांस्कृतिक इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि ये पर्यावरणीय रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. इन पेड़ों के तने, शाखाओं और जड़ों की जटिल संरचना अनगिनत पक्षियों, कीड़ों और अन्य जीवों के लिए आवश्यक आश्रय और भोजन प्रदान करती है. भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने भी इस बात पर जोर दिया है कि बरगद अपनी जटिल संरचना के कारण विभिन्न वन्यजीवों के लिए आवास उपलब्ध कराते हैं और भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में सदियों से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं.
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मौजूद अन्य पुराने और विरासत वाले पेड़ों की उम्र वैज्ञानिक तरीके से निर्धारित करने का मार्ग प्रशस्त करेगा. इस वैज्ञानिक पद्धति से ऐसे पेड़ों की दीर्घायु और पारिस्थितिकी तंत्र में उनके महत्व को गहराई से समझने में मदद मिलेगी, जिससे उनके संरक्षण के प्रयासों को भी बल मिलेगा. मुंगेर का यह बरगद अब केवल एक प्राचीन वृक्ष नहीं, बल्कि उष्णकटिबंधीय विरासत वृक्षों के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है.







