Bihar Dussehra 2026: आगामी विजयादशमी और दुर्गा-विसर्जन की तिथि को लेकर बिहार में चल रही चर्चाओं के बीच धर्मशास्त्रियों और ज्योतिष विद्वानों ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। वर्ष 2026 में दशहरा पर्व
के लिए 21 अक्टूबर की तारीख को ही शास्त्रीय दृष्टि से उपयुक्त माना जा रहा है। यह निर्णय केवल कैलेंडर की तारीख पर आधारित नहीं, बल्कि सूर्योदय के समय तिथि की मौजूदगी, कर्मकाल और धर्मशास्त्रीय विधानों के गहन विश्लेषण पर टिका है।
ज्योतिष डॉ राघव नाथ झा ने बताया पंचांग गणना के अनुसार, 20 अक्टूबर, 2026 को सूर्योदय के समय नवमी तिथि रहेगी, जो सुबह 9:46 बजे तक चलेगी। इसके बाद दशमी तिथि शुरू होगी। वहीं, 21 अक्टूबर को सूर्योदय के समय दशमी तिथि मौजूद रहेगी और यह पूर्वाह्न 11:02 बजे तक बनी रहेगी। इसी स्थिति ने 20 अक्टूबर की नवमी-विद्ध दशमी और 21 अक्टूबर की सूर्योदयव्यापिनी दशमी में से किसी एक को चुनने का महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया था।
विजयादशमी और दुर्गा विसर्जन: विद्वानों की एक राय
धर्मशास्त्र और ज्योतिष के विभिन्न विद्वानों ने कर्मकाल और तिथि-व्याप्ति के आधार पर 21 अक्टूबर के पक्ष में अपनी राय दी है। ज्योतिर्वेद विज्ञान संस्थान के निदेशक और वरिष्ठ धर्मशास्त्री डॉ राजनाथ झा ने इस विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि विजयादशमी और दुर्गा-विसर्जन जैसे धार्मिक कार्यों में पूर्वाह्न और सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि का विशेष महत्व होता है। उन्होंने ‘पूर्वाह्णो वै देवानाम्’ के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए बताया कि देवकर्म के लिए पूर्वाह्न को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
विष्णुधर्मोत्तर के प्रमाण ‘प्रातरावाहयेद् देवीं… प्रातरेव विसर्जयेत्’ का जिक्र करते हुए डॉ. राजनाथ झा ने कहा कि देवी के आवाहन, पूजन और विसर्जन में प्रातःकाल का विशेष विधान है। उन्होंने नन्दिकेश्वर के वचन ‘रवेरुदयगामिन्यां ताः सर्वाः कारयेद्बुधः’ से भी सूर्योदयगामिनी तिथि के महत्व की पुष्टि की। उनके अनुसार, 21 अक्टूबर को सूर्योदय से 11:02 बजे तक दशमी की उपलब्धता प्रातःकालीन कर्म के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती है।
शास्त्रों के अनुसार 21 अक्टूबर ही शुभ
वरिष्ठ धर्मशास्त्री डॉ विश्वनाथ झा ने ‘नारद’ के प्रमाण को प्रमुख आधार बताया। उन्होंने कहा कि आश्विन शुक्ल पक्ष में सूर्योदय के समय दशमी तिथि का होना ही विजयादशमी कहलाता है। नारद पुराण में कहा गया है: ‘सूर्योदये यदा राजन् दृश्यते दशमी तिथिः। आश्विने मासि शुक्ले तु विजयां तां विदुर्बुधाः॥’ इस श्लोक के आधार पर 21 अक्टूबर की सूर्योदयव्यापिनी दशमी ही निर्णय का महत्वपूर्ण आधार बनती है।
कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के सहायक प्राचार्य एवं गणितकर्ता-सहसम्पादक, विश्वविद्यालय पंचांग, डॉ वरुण कुमार झा ने स्पष्ट किया कि पंचांग केवल तारीखों की सूची नहीं है, बल्कि यह तिथि, सूर्योदय, कर्मकाल और गणित का एक जटिल समन्वय है। उन्होंने कहा कि 20 अक्टूबर को सूर्योदय पर नवमी और 21 अक्टूबर को सूर्योदय पर दशमी होने की स्थिति को समान रूप से नहीं देखा जा सकता।
श्री जगदम्बा संस्कृत महाविद्यालय, बाथो, दरभंगा के सहायक प्राध्यापक ज्योतिष डॉ राम कुमार झा ने ‘लल्लस्मृति’ के वचन ‘तिथिः प्रमाणं तिथिरेव साधनम्’ का उल्लेख करते हुए बताया कि धार्मिक कर्मों के निर्णय में तिथि की वास्तविक स्थिति को ही आधार बनाया जाना चाहिए। मीमांसा विद्वान डॉ देव कृष्ण झा ने भी ‘तिथिः शरीरं देवस्य…’ के अनुसार तिथि को ही देवकर्म का मूल आधार और प्रधान तत्व बताया।
अत्यल्प दशमी की स्थिति में ही बदलता है नियम
गणितकर्ता एवं संपादक डॉ राकेश कुमार झा ने ‘हेमाद्रि’ के विधान का हवाला देते हुए बताया कि अगले दिन दशमी यदि बहुत कम समय के लिए हो, तभी पूर्वदिन की विशेष व्यवस्था का प्रश्न उठता है। वर्तमान गणना के अनुसार, 21 अक्टूबर को दशमी पूर्वाह्न 11:02 बजे तक है, जो कि पर्याप्त समय है। खगड़िया के ज्योतिषाचार्य डॉ शुभम सावर्ण ने योगिनीतंत्र के प्रमाण का उल्लेख करते हुए सूर्योदयगामिनी तिथि के महत्व को दोहराया और नवमी के कर्मकाल में दशमी ग्रहण करने से बचने का भी विधान बताया।
विद्वानों के अनुसार, 21 अक्टूबर की दशमी केवल सूर्योदय-स्पर्श मात्र नहीं है, बल्कि पूर्वाह्न तक पर्याप्त समय के लिए मौजूद है। यह स्थिति विजयादशमी और दुर्गा-विसर्जन जैसे प्रातःकालीन देवकर्मों के लिए अत्यंत विचारणीय है। पूर्ववर्ती पंचांग-परंपरा में 1998 (संवत् 2055) का उदाहरण भी इस संदर्भ में दिया गया है, जहां तिथि की वास्तविक व्याप्ति और कर्मकाल के आधार पर विजयादशमी का निर्णय किया गया था। यह दर्शाता है कि तिथि-निर्णय में केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि सूर्योदय और कर्मकाल की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है।
समग्र रूप से उपलब्ध गणना और प्रस्तुत धर्मशास्त्रीय प्रमाणों को देखते हुए, 21 अक्टूबर, 2026 की सूर्योदयव्यापिनी दशमी में ही विजयादशमी और बिहार दशहरा 2026 दुर्गा-विसर्जन का पक्ष शास्त्रीय आधार के साथ मजबूत है। वहीं, 20 अक्टूबर को नवमी-संबंधी पूजन और हवन का क्रम रखा जा सकता है। अंतिम आचार-निर्णय में स्थानीय पंचांग, परंपरा और संबंधित कर्म-विधानों पर भी विचार अपेक्षित है।








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