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किसानों का टूटा सब्र! दरभंगा में पैक्स ने रोका धान खरीद, औने-पौने दाम पर अनाज बेचने को मजबूर अन्नदाता

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दरभंगा, देशज टाइम्स। दरभंगा में अन्नदाताओं की उम्मीदों पर फिर गया पानी. जिस धान को उन्होंने खून-पसीने से सींचा, अब उसे औने-पौने दाम पर बेचने की मजबूरी है. सवाल है कि आखिर क्यों पैक्स धान की खरीद से मुंह मोड़ रहे हैं और किसान इस मुश्किल घड़ी में कहां जाएं?

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बिहार के दरभंगा जिले में धान कटाई का मौसम अपने चरम पर है, लेकिन किसानों की चिंताएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. प्रखंडों में प्राथमिक कृषि साख समितियों (पैक्स) द्वारा धान की खरीदारी शुरू नहीं किए जाने से अन्नदाताओं में भारी निराशा है. अपनी मेहनत की उपज को रखने और बेचने की जद्दोजहद में फंसे किसान अब औने-पौने दाम पर बिचौलियों के हाथों धान बेचने को विवश हो रहे हैं.

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धान खरीद में अड़चन: किसानों की पीड़ा

किसान लंबे समय से सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर धान बेचने का इंतजार कर रहे थे. लेकिन, पैक्स की निष्क्रियता ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. कई किसानों ने बताया कि उन्हें अपने परिवार का भरण-पोषण करने और अगली फसल के लिए तैयारी करने हेतु पैसों की तत्काल आवश्यकता है. ऐसे में जब सरकारी खरीद केंद्र बंद पड़े हैं, उनके पास व्यापारियों को कम कीमत पर धान बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता.

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ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या और भी गंभीर है, जहां छोटे और सीमांत किसानों की संख्या अधिक है. इनके पास धान को लंबे समय तक स्टोर करने की उचित व्यवस्था नहीं होती. मजबूरन, वे बिचौलियों के चंगुल में फंस जाते हैं, जो बाजार मूल्य से काफी कम दाम पर उनकी फसल खरीदते हैं और बाद में उसे अधिक कीमत पर बेचकर मुनाफा कमाते हैं.

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क्या है पैक्स और उसकी भूमिका?

प्राथमिक कृषि साख समितियां (पैक्स) ग्रामीण स्तर पर किसानों को ऋण सुविधा और कृषि उपज की खरीद-बिक्री में मदद करने के लिए बनाई गई सहकारी संस्थाएं हैं. सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों से धान और गेहूं जैसी फसलें खरीदने के लिए पैक्स को अधिकृत करती है. इसका मुख्य उद्देश्य किसानों को बिचौलियों के शोषण से बचाना और उन्हें उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाना है.

हालांकि, दरभंगा में पैक्स की इस निष्क्रियता ने उसके मूल उद्देश्य पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं. किसानों का कहना है कि यदि पैक्स ही उनकी मदद नहीं करेगा, तो सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य की पूरी अवधारणा का कोई लाभ नहीं रह जाएगा.

सरकारी उदासीनता या व्यवस्था की कमी?

इस पूरे मामले में प्रशासनिक लापरवाही और व्यवस्थागत खामियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. किसानों का आरोप है कि सरकार और संबंधित विभाग इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे हैं. धान खरीद में देरी के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें फंड की कमी, भंडारण की समस्या, बारदाने की अनुपलब्धता या प्रशासनिक स्वीकृति में विलंब शामिल हैं.

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जो भी कारण हों, इसका सीधा खामियाजा अन्नदाताओं को भुगतना पड़ रहा है. एक तरफ जहां किसान अपनी फसल का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बाजार में बिचौलियों की चांदी हो रही है.

किसानों के सामने विकल्प क्या?

फिलहाल, दरभंगा के किसानों के सामने सीमित विकल्प हैं. वे या तो निजी व्यापारियों को कम दाम पर अपनी उपज बेचें, या फिर धान खरीद शुरू होने का इंतजार करें, जिसमें अनिश्चितता का माहौल है. यह स्थिति न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर रही है, बल्कि उन्हें हतोत्साहित भी कर रही है. स्थानीय प्रशासन और सरकार से तत्काल हस्तक्षेप कर धान खरीद प्रक्रिया को अविलंब शुरू करने की मांग की जा रही है, ताकि किसानों को उनके हक का उचित मूल्य मिल सके और उनकी पीड़ा कम हो सके.

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