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मुजफ्फरपुर के गायघाट में खुला खेल , कांटा की लाइब्रेरी में किताबों की जगह ‘डॉक्टर’ का कब्जा, सरकारी फंड पर सवाल

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गायघाट न्यूज़: बिहार के गायघाट में एक ऐसी लाइब्रेरी है, जहाँ ज्ञान की गंगा तो सूख चुकी है, लेकिन भ्रष्टाचार की खेती खूब फल-फूल रही है। किताबों की जगह यहाँ एक निजी होम्योपैथी क्लीनिक चल रहा है और सरकारी फंड से हो रहे खेल का खुलासा चौंकाने वाला है।

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पुस्तकालय में निजी क्लीनिक का संचालन

मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट प्रखंड के कांटा पंचायत में स्थित कांटा पुस्तकालय, जिसे छात्रों और ग्रामीणों के लिए ज्ञान का केंद्र होना चाहिए था, आज एक निजी होम्योपैथी क्लीनिक में तब्दील हो गया है। जानकारी के अनुसार, हर मंगलवार को इस पुस्तकालय परिसर में होम्योपैथी डॉक्टर सुनील कुमार अपना निजी क्लिनिक संचालित करते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि सप्ताह के बाकी छह दिन पुस्तकालय में ताला लटका रहता है। इसकी चाभी होम्योपैथी डॉक्टर के रिश्तेदार और स्थानीय डीलर बउआ डीलर के पास रहती है। बताया जाता है कि पुस्तकालय केवल तभी खोला जाता है, जब डीलर या उनके करीबी लोगों को इसकी आवश्यकता पड़ती है।

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सरकारी पैसों का कथित बंदरबांट

यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है। एक पुस्तकालय के संचालन में पुस्तकें खरीदने, स्टाफ के वेतन, बिजली बिल और अन्य रखरखाव पर सरकारी फंड और पंचायत कोष से पैसे खर्च किए जाते हैं। हालांकि, कांटा पुस्तकालय के मामले में ये सभी खर्चे केवल कागजों पर ही दिखाई देते हैं। आरोप है कि इन सभी मदों में आवंटित राशि का गबन कर लिया जाता है और इसे डीलर, मुखिया और पंचायत समिति के सदस्यों द्वारा आपस में बांट लिया जाता है। इस कथित भ्रष्टाचार का सीधा असर गांव के गरीब और प्रतिभावान बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है, जिन्हें पुस्तकालय की सुविधा से वंचित रखा जा रहा है।

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निजी स्वार्थ की भेंट चढ़ा ज्ञान का मंदिर

डॉक्टर सुनील कुमार द्वारा पुस्तकालय में चलाए जा रहे निजी क्लिनिक को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यह बताया जा रहा है कि यह क्लिनिक किसी समाज सेवा के उद्देश्य से नहीं, बल्कि पूरी तरह से व्यावसायिक आधार पर संचालित हो रहा है। यहाँ गरीबों, दलितों, पिछड़ों या अति-पिछड़ों का मुफ्त इलाज नहीं किया जाता है। आरोप है कि इस पूरे गोरखधंधे का एकमात्र एजेंडा सार्वजनिक संपत्ति का दोहन करके अपनी जेब भरना है, जिसमें अपना एक रुपया भी खर्च न करना पड़े।

पुराने पुस्तकालय का भी यही हश्र

यह पहली बार नहीं है जब कांटा गांव में किसी पुस्तकालय के साथ ऐसा दुर्व्यवहार हुआ हो। गांव का एक पुराना और ऐतिहासिक पुस्तकालय भी इसी परिवार के स्वार्थ की भेंट चढ़ गया था। उस समय भी पुस्तकालय के दो कमरों पर कब्जा करके उन्हें चिकित्सालय में बदल दिया गया था, जबकि बाकी हिस्से को वीरान छोड़ दिया गया। कथित तौर पर, उस जगह से अच्छी कमाई की गई, लेकिन उसके मरम्मत या रखरखाव पर कभी एक पैसा खर्च नहीं किया गया। जिसका नतीजा यह हुआ कि वह पुस्तकालय खंडहर में तब्दील हो गया और आज भी उसी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मौजूद है।

पूर्व विधायक की पहल भी हुई बेकार

वर्तमान कांटा पुस्तकालय का निर्माण पूर्व विधायक और समाजवादी नेता महेश्वर यादव ने इस नेक उद्देश्य से करवाया था कि गांव-समाज के गरीब और प्रतिभावान बच्चों को पढ़ाई-लिखाई में मदद मिल सके। विडंबना यह है कि इस पुस्तकालय के निर्माण का ठेका भी कथित तौर पर उसी डीलर ने लिया था, और तब से लेकर आज तक उस पर उसका कब्जा बना हुआ है। आरोप है कि इतने वर्षों में भी इस पुस्तकालय में गांव के किसी भी विद्यार्थी के लिए नामांकन रजिस्टर तक नहीं बनाया गया है, जिससे साफ पता चलता है कि इसका उपयोग विद्यार्थियों के लिए नहीं हो रहा है, बल्कि निजी हितों की पूर्ति के लिए किया जा रहा है।

विकास के राह में भ्रष्टाचार की दीवार

कांटा पंचायत में यह घटना भ्रष्टाचार का एक जीवंत और शर्मनाक उदाहरण प्रस्तुत करती है। जब तक ऐसे लोग गांव-समाज के महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करते रहेंगे, तब तक किसी भी गांव या समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं हो पाएगा। यह स्थिति प्रशासन और संबंधित अधिकारियों के लिए एक गंभीर चुनौती है कि वे सार्वजनिक संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकें और उन्हें उनके मूल उद्देश्य के लिए पुनर्जीवित करें, ताकि गांव के बच्चों को शिक्षा का उचित अवसर मिल सके।

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