Bihar MLC Election: नवंबर 2026 में बिहार विधान परिषद की चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पटना, तिरहुत, दरभंगा और कोसी की इन महत्वपूर्ण सीटों के लिए एनडीए और महागठबंधन सहित सभी दल अपनी रणनीति बनाने में जुट गए हैं। इस बार के मुकाबले की खास बात यह है कि नए राजनीतिक दलों और संभावित निर्दलीय उम्मीदवारों की सक्रियता ने समीकरणों को और रोचक बना दिया है। इन चुनावों में रोजगार, उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएं और युवाओं से जुड़े सवाल चुनावी चर्चा के केंद्र में रहने की संभावना है।
हालांकि अभी कई प्रमुख दलों ने अपने उम्मीदवारों की आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन राजनीतिक दावे-प्रतिदावे लगातार तेज हो रहे हैं। नवंबर 2026 में केवल सीटें खाली नहीं होंगी, बल्कि बिहार की राजनीति को स्नातक मतदाताओं के बीच अपनी ताकत दिखाने का एक नया अवसर भी मिलेगा। इन MLC चुनावों की प्रकृति विधानसभा और लोकसभा चुनावों से काफी अलग होती है, क्योंकि यहां मतदाताओं का दायरा विशेष होता है और उम्मीदवारों को शिक्षित वर्ग के बीच अपनी पकड़ साबित करनी पड़ती है। यही वजह है कि रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दे इस बार और अधिक महत्वपूर्ण दिखाई दे रहे हैं।
पटना स्नातक सीट: नीरज कुमार की हैट्रिक और नई चुनौती
पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में फिलहाल जदयू के नीरज कुमार प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वर्ष 2020 के पिछले चुनाव में उन्होंने राजद के आजाद गांधी को 8,252 वोटों के बड़े अंतर से हराया था। नीरज कुमार को कुल 20,948 वोट मिले थे, जबकि आजाद गांधी ने 12,696 मत प्राप्त किए थे। उस जीत के साथ नीरज कुमार ने इस सीट पर जीत की हैट्रिक पूरी की थी।
हालांकि, 2026 का चुनाव पहले की तुलना में बदली हुई परिस्थितियों में हो सकता है। पटना स्नातक क्षेत्र में जन सुराज पार्टी की गतिविधियों पर भी राजनीतिक गलियारों की पैनी नजर है। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के बाद इस पार्टी ने अपनी राजनीतिक मौजूदगी को लेकर नए संकेत दिए हैं। पटना क्षेत्र में बेरोजगारी और नौकरी का सवाल युवाओं के बीच एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र, उच्च शिक्षा से जुड़े युवा और रोजगार की तलाश कर रहे स्नातक मतदाता इस चुनावी बहस को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकते हैं। पटना की सीट पर सबसे बड़ी चुनौती केवल किसी एक उम्मीदवार को हराने की नहीं होगी, बल्कि असली सवाल यह होगा कि कौन सा दल शिक्षित युवाओं की अपेक्षाओं को चुनावी समर्थन में बदल पाता है। यदि रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं का मुद्दा जोर पकड़ता है, तो पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव भी दिखाई दे सकता है।
तिरहुत स्नातक सीट: बंशीधर ब्रजवासी और बदलते समीकरण
तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की स्थिति भी काफी दिलचस्प बनी हुई है। यहां के वर्तमान प्रतिनिधि बंशीधर ब्रजवासी हैं, जिन्होंने 2024 के उपचुनाव में एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की थी। शिक्षक नेता के रूप में अपनी पहचान रखने वाले ब्रजवासी ने जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार डॉ. विनायक गौतम को लगभग 10,195 मतों के अंतर से शिकस्त दी थी।
पिछले उपचुनाव के दौरान बंशीधर ब्रजवासी खासे चर्चा में रहे थे। शिक्षा व्यवस्था और तत्कालीन अपर मुख्य सचिव केके पाठक के साथ उनके विवाद ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई, जिसका राजनीतिक असर चुनाव में भी साफ दिखाई दिया और जदयू उम्मीदवार अभिषेक झा को हार का सामना करना पड़ा। अब 2026 के चुनाव से पहले समीकरण फिर बदलते दिख रहे हैं। एनडीए की ओर से जदयू के अभिषेक झा फिर से तैयारी में जुटे बताए जा रहे हैं। दूसरी तरफ, सबसे बड़ा सवाल बंशीधर ब्रजवासी की राजनीतिक राह को लेकर है। वह फिर निर्दलीय मैदान में उतरेंगे या किसी राजनीतिक दल का समर्थन लेंगे, इसे लेकर चर्चाएं जारी हैं। अगस्त 2026 में बंशीधर ब्रजवासी की सम्राट चौधरी से हुई मुलाकात के बाद राजनीतिक अटकलों को और हवा मिली है। चर्चाएं हैं कि क्या भविष्य में उन्हें भाजपा की ओर से मौका मिल सकता है। हालांकि, चुनावी तस्वीर उम्मीदवारों की आधिकारिक घोषणा के बाद ही साफ होगी। यदि राजनीतिक समर्थन का समीकरण बदलता है तो तिरहुत में मुकाबले का स्वरूप भी बदल सकता है। तिरहुत में कृष्ण नंदन त्रिवेदी ने भी चुनाव लड़ने की घोषणा कर रखी है। उनकी दावेदारी कितनी मजबूत साबित होती है, यह चुनाव के दौरान स्पष्ट होगा। यहां भी रोजगार और शिक्षा के सवाल स्नातक मतदाताओं के बीच महत्वपूर्ण बने रहने की संभावना है।
दरभंगा स्नातक सीट: निर्दलीय बनाम गठबंधन
दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में वर्तमान प्रतिनिधि निर्दलीय सर्वेश कुमार हैं। पिछले चुनाव में सर्वेश कुमार को 15,595 वोट मिले थे। जदयू के डॉ. दिलीप कुमार चौधरी 11,676 मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे, जबकि राजद के अनिल कुमार झा को 9,356 वोट मिले थे और वह तीसरे स्थान पर रहे थे।
इस सीट पर अभी तक किसी बड़े गठबंधन ने आधिकारिक उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि महागठबंधन की ओर से राजद एक बार फिर अनिल कुमार झा को मैदान में उतार सकती है। वहीं, छात्र राजनीति से जुड़े दिलीप कुमार के भी चुनाव लड़ने की संभावना को लेकर चर्चा है। एनडीए के भीतर यह सीट जदयू के हिस्से में मानी जाती है, लेकिन पार्टी ने फिलहाल उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं किया है। ऐसे में दरभंगा की चुनावी तस्वीर अभी अधूरी है। उम्मीदवारों की घोषणा के बाद ही यहां मुकाबले का वास्तविक स्वरूप सामने आएगा।
कोसी स्नातक सीट: भाजपा का गढ़ और नए दावेदार
कोसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के डॉ. एनके यादव वर्तमान प्रतिनिधि हैं। पिछले चुनाव में उन्होंने प्रभावशाली जीत दर्ज की थी। डॉ. एनके यादव को 20,841 वोट मिले थे, जबकि राजद के नितेश कुमार को 13,940 मत प्राप्त हुए थे। भाजपा उम्मीदवार ने 6,901 वोटों के अंतर से यह सीट जीती थी।
कोसी सीट पर भी नई दावेदारियां सामने आने लगी हैं। रजनीश रंजन ने चुनाव लड़ने की घोषणा की है, हालांकि प्रमुख राजनीतिक दलों की अंतिम रणनीति सामने आना बाकी है। कोसी की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां इस चुनाव को एक अलग दिशा दे सकती हैं। यहां युवाओं, रोजगार और स्नातक मतदाताओं से जुड़े स्थानीय मुद्दों की भूमिका अहम हो सकती है।
नए दल और निर्दलीय उम्मीदवारों का बढ़ता प्रभाव
चारों स्नातक सीटों की सबसे बड़ी समानता यह है कि अभी चुनावी मैदान पूरी तरह तैयार नहीं हुआ है। प्रमुख दलों के उम्मीदवारों की घोषणा बाकी है और कई संभावित निर्दलीय उम्मीदवार भी अपनी राजनीतिक संभावनाओं को तलाश रहे हैं। यही वजह है कि फिलहाल किसी भी सीट पर अंतिम मुकाबले का स्पष्ट अनुमान लगाना मुश्किल है।
इस बिहार MLC चुनाव में दो नए राजनीतिक दलों की सक्रियता भी बड़े गठबंधनों के लिए एक नई चुनौती बन सकती है। जन सुराज और जनशक्ति जनता दल की संभावित रणनीति पर राजनीतिक दलों की नजर बनी हुई है। यदि ये दल मजबूत उम्मीदवार उतारते हैं तो वोटों का बंटवारा कई सीटों पर असर डाल सकता है। बिहार के स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तिरहुत और दरभंगा के पिछले चुनावी परिणाम यह दिखा चुके हैं कि केवल बड़े दल का चुनाव चिह्न जीत की गारंटी नहीं है। स्थानीय पहचान, शिक्षा से जुड़े आंदोलन और मतदाताओं के साथ व्यक्तिगत संपर्क भी यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो आने वाले चुनाव में भी निर्णायक साबित होंगे।







