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Bihar MLC Election चुनाव के अतरंगी कलर ! ललन सिंह अब अनंत सिंह के ‘संकटमोचक’, कभी थे कट्टर विरोधी; ऐसे बदली बिहार की सियासत -बूझे की नाहीं

Bihar MLC Election: बिहार की सियासत में ललन सिंह और अनंत सिंह के दुश्मनी से दोस्ती तक का सफर चौंकाता है; अब जदयू में नीरज कुमार से जारी विवाद में केंद्रीय मंत्री की मध्यस्थता पर सबकी नजर।

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Bihar MLC Election: बिहार की राजनीति में रिश्ते कभी स्थायी नहीं रहते। यहां समय, परिस्थितियों और राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से समीकरण बदलते रहते हैं। केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और मोकामा विधायक अनंत सिंह के रिश्तों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक दौर था, जब दोनों के बीच राजनीतिक दूरियां साफ नजर आती थीं। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में तो अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी ने मुंगेर सीट पर ललन सिंह के खिलाफ ताल ठोक दी थी। लेकिन, वक्त के साथ रिश्तों की गर्माहट बढ़ने लगी। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में अनंत सिंह ने ललन सिंह के पक्ष में प्रचार किया, तो 2025 के विधानसभा चुनाव में ललन सिंह ने अनंत सिंह के लिए मोर्चा संभाला। अब 2026 के पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के बिहार MLC चुनाव में जदयू के दो नेताओं अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच टकराव के दौरान ललन सिंह की भूमिका पर सबकी नजर है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि कभी अलग-अलग खेमों में नजर आने वाले ये नेता आज एक-दूसरे के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं?

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नीतीश कुमार से नजदीकी और शुरुआती राजनीतिक संबंध

1990 के दशक में मोकामा और आसपास के इलाकों में अनंत सिंह और उनके बड़े भाई दिलीप सिंह का गहरा प्रभाव था। उस समय नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे थे। कहा जाता है कि दिलीप सिंह और अनंत सिंह ने नीतीश कुमार का साथ दिया। यह राजनीतिक संबंध धीरे-धीरे और मजबूत होता गया। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में अनंत सिंह ने नीतीश कुमार का समर्थन किया। इसके बाद 2005 में नीतीश कुमार ने उन्हें जदयू का टिकट दिया। अनंत सिंह ने मोकामा विधानसभा सीट से पहली बार चुनाव लड़ा और लोजपा उम्मीदवार नलिनी रंजन शर्मा को हराकर जीत दर्ज की। उस दौरान ललन सिंह जदयू के वरिष्ठ नेताओं में शामिल थे और नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाते थे। इसलिए, शुरुआती दौर में अनंत सिंह और ललन सिंह के बीच राजनीतिक संबंध सहज रहे थे।

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नीतीश कुमार से नजदीकी बढ़ने के साथ अनंत सिंह का राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ता गया। वर्ष 2006 में उनके बड़े भाई दिलीप सिंह की हत्या के बाद नीतीश कुमार और ललन सिंह उनके गांव नदवां पहुंचे थे। इस घटना ने अनंत सिंह को राजनीतिक स्तर पर समर्थन दिया और उनकी नीतीश कुमार से नजदीकी और मजबूत हुई। वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव में जदयू ने एक बार फिर अनंत सिंह पर भरोसा जताया और वह मोकामा से विधायक चुने गए। इस तरह, 2005 से 2015 तक का दौर अनंत सिंह के जदयू और नीतीश कुमार के साथ मजबूती से जुड़े रहने का रहा। इस अवधि में पार्टी में ललन सिंह का प्रभाव भी बरकरार था और दोनों के बीच किसी बड़े राजनीतिक टकराव की स्थिति नहीं आई।

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2015: रिश्तों में आई बड़ी दरार और अनंत सिंह का निर्दलीय सफर

वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया। जदयू ने भाजपा से गठबंधन तोड़कर राजद के साथ हाथ मिला लिया। हालांकि, इस बदलाव के बावजूद अनंत सिंह और नीतीश कुमार के संबंधों में तत्काल कोई बड़ी खटास नहीं आई। इसी दौरान बाढ़ अनुमंडल क्षेत्र में पुटुस यादव की हत्या का मामला सामने आया, जिसमें अनंत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद अनंत सिंह ने जदयू छोड़ दिया और मोकामा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरे। जदयू ने उनके खिलाफ नीरज कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया था। उस समय जेल में होने के बावजूद अनंत सिंह ने नीरज कुमार को लगभग 18 हजार वोटों से हरा दिया। इस चुनाव के बाद अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच राजनीतिक तल्खी काफी बढ़ गई। आने वाले वर्षों में दोनों के बीच टकराव लगातार चर्चा में रहा।

मुंगेर की सियासी जंग से मोकामा की दोस्ती तक

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में अनंत सिंह और ललन सिंह के बीच राजनीतिक मुकाबला सीधे मुंगेर तक पहुंच गया। जदयू ने ललन सिंह को उम्मीदवार बनाया, जबकि अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी कांग्रेस के टिकट पर उनके खिलाफ चुनाव मैदान में उतरीं। इस चुनाव में नीलम देवी को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन इस मुकाबले ने दोनों नेताओं के बीच दूरी को राजनीतिक रूप से उजागर कर दिया। हालांकि, बिहार की राजनीति में समीकरण फिर तेजी से बदले। समय के साथ ललन सिंह और अनंत सिंह के रिश्तों में नजदीकियां बढ़ने लगीं। दोनों के बीच पुरानी दूरी कम हुई, लेकिन नीरज कुमार के साथ अनंत सिंह की तल्खी बरकरार रही। यही विरोधाभास आगे चलकर जदयू की राजनीति में एक महत्वपूर्ण सवाल बन गया।

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वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों नेताओं के रिश्तों में आए बदलाव की तस्वीर साफ दिखी। इस बार अनंत सिंह ललन सिंह के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके समर्थन में खड़े नजर आए। जेल से 15 दिनों की पैरोल पर बाहर आने के बाद अनंत सिंह ने घर बैठने के बजाय ललन सिंह के पक्ष में चुनाव प्रचार किया और रोड शो भी किए। मुंगेर लोकसभा क्षेत्र में मोकामा भी शामिल है। ऐसे में मोकामा में अनंत सिंह का प्रभाव ललन सिंह के लिए काफी अहम माना गया। अनंत सिंह के प्रचार ने दोनों नेताओं की नजदीकी को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया। चुनाव में ललन सिंह ने जीत दर्ज की और इस दौरान दोनों के बीच बेहतर होते संबंधों की चर्चा तेज हो गई।

2026 MLC चुनाव: ललन सिंह की नई भूमिका

वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में जदयू ने अनंत सिंह पर फिर भरोसा जताया और उन्हें मोकामा से उम्मीदवार बनाया। लेकिन, चुनाव से पहले दुलारचंद यादव हत्याकांड के मामले में अनंत सिंह की गिरफ्तारी हो गई। उनके जेल जाने के बाद ललन सिंह मोकामा पहुंचे और अनंत सिंह के समर्थन में प्रचार किया। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों से जदयू उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने की अपील की। चुनाव परिणाम आने पर अनंत सिंह ने जीत दर्ज की। इस तरह, 2019 में जहां दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक मुकाबले की तस्वीर थी, वहीं 2025 तक दोनों एक-दूसरे के समर्थन में खड़े नजर आने लगे। यह बदलाव बिहार की राजनीति में उनकी दोस्ती और बदलते समीकरणों की सबसे अहम कड़ी बन गया।

अनंत सिंह का आरोप है कि ‘नीरज कुमार ने उनके पक्ष में प्रचार नहीं किया, बल्कि उनके विरोधियों को समर्थन देकर उन्हें चुनाव में नुकसान पहुंचाने की कोशिश की।’

हालांकि, अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच विवाद खत्म नहीं हुआ। अनंत सिंह का आरोप रहा है कि नीरज कुमार ने उनके पक्ष में प्रचार नहीं किया, बल्कि उनके विरोधियों को समर्थन देकर उन्हें चुनाव में नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। जदयू के भीतर इस विवाद ने दोनों नेताओं के रिश्तों को फिर चर्चा में ला दिया। अब 2026 में अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच विवाद एक बार फिर सामने आ गया है। इस बार मामला पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जुड़ा है, जहां जदयू ने नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया है। अनंत सिंह के उनके खिलाफ बागी रुख अपनाने से पार्टी के भीतर असहज स्थिति पैदा हो गई है।

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मामले को सुलझाने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दो बार बैठक की। इसके बाद जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने विवाद के समाधान की जिम्मेदारी ललन सिंह को सौंपी। शुरुआत में ललन सिंह ने इस जिम्मेदारी से दूरी बनाने की कोशिश की, लेकिन नीतीश कुमार से बातचीत के बाद उन्होंने पहल की। इस पूरे घटनाक्रम में उनकी भूमिका इसलिए भी अहम हो गई है, क्योंकि वह नीरज कुमार और अनंत सिंह के बीच विवाद सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि अनंत सिंह के साथ उनकी राजनीतिक नजदीकी पहले से ही चर्चा में है। राजनीतिक जानकार इस बदलते समीकरण के पीछे मोकामा और मुंगेर का क्षेत्रीय प्रभाव, अनंत सिंह की स्थानीय पकड़, भूमिहार राजनीति में उनकी भूमिका और जदयू की राजनीतिक जरूरतों जैसे पहलुओं को अहम मानते हैं।

ललन सिंह और अनंत सिंह के रिश्तों को केवल दुश्मनी से दोस्ती तक की कहानी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह बिहार की राजनीति में बदलते हितों, क्षेत्रीय प्रभाव और पार्टी की जरूरतों के साथ बदलते समीकरणों की कहानी है। वर्ष 2019 में जहां दोनों अलग-अलग राजनीतिक खेमों में खड़े थे, वहीं 2024 और 2025 में एक-दूसरे के समर्थन में नजर आए। अब 2026 के बिहार MLC चुनाव में अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच टकराव को सुलझाने की जिम्मेदारी भी ललन सिंह को मिली है। ऐसे में उनकी भूमिका पर सबकी नजर है। बिहार की राजनीति का यह घटनाक्रम बताता है कि यहां रिश्ते केवल अतीत के आधार पर तय नहीं होते, बल्कि बदलती परिस्थितियां, चुनावी जरूरतें और क्षेत्रीय समीकरण पुराने विरोधियों को करीब ला सकते हैं और पुराने विवादों को फिर सामने भी ला सकते हैं।

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