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अक्टूबर, 29, 2026
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बिहार की इस चीनी मिल की ‘अजीब किस्मत’, बंद रही तो सवाल, अब खुलने पर भी बवाल! | पढ़िए – एक सदी से भी पुरानी इतिहास और जिद पर अड़े लोग?

Bihar Sugar Mill: सारण की ऐतिहासिक मढ़ौरा चीनी मिल को मढ़ौरा में ही पुनर्जीवित करने की मांग तेज हो गई है। तरैया के रामकोला में नई मिल के संभावित प्रस्ताव से स्थानीय लोगों में गहरा आक्रोश है।

बिहार की इस चीनी मिल की ‘अजीब किस्मत’, बंद रही तो सवाल, अब खुलने पर भी बवाल! | पढ़िए – एक सदी से भी पुरानी  इतिहास और जिद पर अड़े लोग?
बिहार की इस चीनी मिल की ‘अजीब किस्मत’, बंद रही तो सवाल, अब खुलने पर भी बवाल! | पढ़िए – एक सदी से भी पुरानी इतिहास और जिद पर अड़े लोग?

Bihar Sugar Mill: सारण जिले की मढ़ौरा चीनी मिल करीब तीन दशक से बंद पड़ी है, लेकिन इसकी ‘अजीब किस्मत’ है कि बंद रहने पर भी हंगामा होता है और अब इसे फिर से शुरू करने की बात पर भी स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं। इस बार विवाद का कारण मिल को मढ़ौरा से बाहर ले जाकर तरैया के रामकोला फार्म हाउस में स्थापित करने की कथित सरकारी पहल है। स्थानीय लोग साफ तौर पर मांग कर रहे हैं कि मिल को मढ़ौरा में ही पुनर्जीवित किया जाए।

मिल परिसर में हुई एक बैठक में युवाओं, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने रामकोला फार्म हाउस में नई चीनी मिल स्थापित करने की चर्चा पर कड़ी आपत्ति जताई। उनका तर्क है कि मढ़ौरा में पहले से ही मिल का विशाल परिसर और सभी आवश्यक आधारभूत ढाँचा मौजूद है, ऐसे में किसी नए स्थान पर जाने का कोई औचित्य नहीं है।

मढ़ौरा में ही मिल शुरू करने पर अड़े स्थानीय लोग

मढ़ौरा में आयोजित इस बैठक में स्थानीय युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक नेताओं ने हिस्सा लिया। बैठक का संचालन राजद व्यवसायी प्रकोष्ठ के नेता विष्णु गुप्ता ने किया। इसमें कांग्रेस नेता लालबाबू गिरी, नीरज कुमार सिंह, आदित्य कुमार, अतुल प्रताप सिंह, मनोज गुप्ता, युवराज भास्कर, उप मुखिया अजीत कुमार सिंह और बीडीसी मोहन साह सहित कई प्रमुख लोग मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा:

मिल शुरू करनी है तो मढ़ौरा में ही की जाए।

विरोध करने वालों की मुख्य दलील है कि मढ़ौरा में पहले से मौजूद औद्योगिक परिसर को छोड़कर किसी दूसरे इलाके में नई चीनी मिल लगाना स्थानीय हित में नहीं होगा। उनका कहना है कि यदि यह Bihar Sugar Mill दोबारा चलती है, तो आसपास के किसानों के लिए गन्ना एक बार फिर नकदी फसल बन सकता है और स्थानीय स्तर पर हजारों रोजगार के अवसर पैदा होंगे। लोगों ने सरकार से मांग की है कि मिल के भविष्य को लेकर कोई भी फैसला लेने से पहले मढ़ौरा के लोगों की राय और यहां उपलब्ध जमीन व पुराने ढांचे को ध्यान में रखा जाए।

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बैठक में यह भी चेतावनी दी गई कि:

यदि जल्द कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई, तो स्थानीय लोग चरणबद्ध आंदोलन शुरू करेंगे।

गन्ना उद्योग विभाग की ओर से तरैया अंचल के रामकोला फार्म हाउस की जमीन को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ने की बात सामने आने के बाद यह विवाद तेज हुआ है। विभाग की 16 जुलाई 2026 की कार्यवाही से संबंधित जानकारी भी सामने आई है, जिसे स्थानीय स्तर पर मढ़ौरा की पुरानी मिल के भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है।

एक सदी से भी पुरानी है मढ़ौरा चीनी मिल का इतिहास

मढ़ौरा चीनी मिल की स्थापना 1904 में कानपुर शुगर वर्क्स द्वारा की गई थी और यह बिहार की शुरुआती एवं महत्वपूर्ण चीनी मिलों में से एक है। बाद के वर्षों में इसका प्रबंधन ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन के हाथों में भी रहा। आजादी के बाद भी यह इकाई लंबे समय तक उत्पादन और रोजगार का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनी रही। मढ़ौरा की औद्योगिक कहानी केवल एक चीनी मिल तक सीमित नहीं थी; कभी यहां चीनी मिल के साथ मॉर्टन फैक्ट्री, सारण इंजीनियरिंग और डिस्टिलरी जैसी औद्योगिक इकाइयां भी थीं, जिन्होंने मढ़ौरा को सारण के प्रमुख औद्योगिक इलाकों में शामिल किया था।

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मिल का मुख्य काम गन्ने से चीनी का उत्पादन था, जिसके लिए आसपास के बड़े इलाके में गन्ने की खेती होती थी। चीनी मिल की गतिविधियों का असर केवल फैक्ट्री परिसर तक सीमित नहीं था, बल्कि आसपास के गांवों की अर्थव्यवस्था तक पहुंचता था। मढ़ौरा की पहचान औद्योगिक गतिविधियों से जुड़ी थी, जिसने यहां रोजगार का बड़ा आधार तैयार किया था। मिल से जुड़े लोगों के अनुसार, आसपास के कई प्रखंडों में गन्ने की खेती का सीधा संबंध मिल से था, और इसके बंद होने के बाद इस कृषि व्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ा।

कब और कैसे बंद हुई यह ऐतिहासिक मिल?

मढ़ौरा चीनी मिल की हालत 1990 के दशक में बिगड़ती गई और आखिरकार 1998 के आसपास इसका उत्पादन पूरी तरह बंद हो गया। रिपोर्टों में 1995 के बाद मिल की स्थिति खराब होने और 1998 में इसके बंद होने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद मिल को दोबारा शुरू कराने की कई कोशिशें हुईं। 1998-99 में इसे लखनऊ की गंगोत्री इंटरप्राइजेज को सौंपने की बात सामने आई, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हुआ। वर्ष 2000 में बिहार राज्य वित्त निगम ने इसे बीमार इकाई घोषित कर अपने कब्जे में ले लिया।

जुलाई 2005 में उद्योगपति जवाहर जायसवाल ने मिल को खरीदा, और 2007 के आसपास इसे फिर से शुरू करने की कोशिश भी हुई। किसानों से गन्ने की खेती करने की अपील की गई और बड़े स्तर पर तैयारी की गई, लेकिन मिल दोबारा उत्पादन शुरू नहीं कर सकी। इस घटना ने स्थानीय लोगों के बीच मिल के पुनर्जीवन को लेकर भरोसे को गहरा झटका दिया, क्योंकि 5 हजार एकड़ क्षेत्र में गन्ने की खेती होने के बावजूद मिल नहीं चली और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

प्रधानमंत्री मोदी ने भी किया था मढ़ौरा मिल का जिक्र

मढ़ौरा चीनी मिल चुनावी राजनीति में लगातार एक मुद्दा बनी रही है। 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मढ़ौरा में एक चुनावी सभा की थी। उस सभा में उन्होंने पुराने औद्योगिक ढांचे, चीनी कारखानों और रोजगार का मुद्दा उठाया था। प्रधानमंत्री ने कहा था:

कभी यहां के चीनी कारखाने किसानों और युवाओं की आर्थिक स्थिति से जुड़े थे।

उन्होंने बिहार में बिजली, पानी, सड़क, पढ़ाई, कमाई और दवाई को विकास के प्रमुख आधार बताते हुए उद्योगों को दोबारा शुरू करने की जरूरत पर जोर दिया था। मढ़ौरा के संदर्भ में उन्होंने उद्योगों को फिर से शुरू करने के लिए कमेटी बनाने और युवाओं को रोजगार देने की बात कही थी। उस वक्त स्थानीय लोगों में उम्मीद जगी थी, लेकिन वर्षों बाद भी मिल की चिमनी से उत्पादन का धुआं नहीं उठा। 2024 में प्रधानमंत्री के सारण दौरे के समय भी स्थानीय लोगों ने एक बार फिर 2015 में कही गई बातों को याद किया और मिल के पुनर्जीवन की उम्मीद जताई थी।

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आगे क्या होगा? मढ़ौरा बनाम रामकोला का विवाद

फिलहाल मढ़ौरा में स्थानीय स्तर पर विरोध की आवाज तेज हो गई है और आंदोलन की चेतावनी भी दी गई है। दूसरी तरफ, राज्य सरकार की चीनी उद्योग से जुड़ी योजनाओं और नई मिलों को बढ़ावा देने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है। ऐसे में मढ़ौरा के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले दिनों में सरकार पुरानी मिल के पुनर्जीवन को प्राथमिकता देती है या क्षेत्र में किसी नई जगह पर चीनी उद्योग स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ती है।

करीब तीन दशक से बंद पड़ी इस Bihar Sugar Mill की कहानी इसलिए भी अलग है, क्योंकि इसके बंद होने पर भी लोगों ने आवाज उठाई और अब इसे फिर से शुरू करने की कोशिशों के बीच भी लोग सड़क पर उतरने की बात कर रहे हैं। यानी, मढ़ौरा की इस मिल के लिए हालात कुछ ऐसे बन गए हैं कि बंद रहे तो सवाल, और खुले तो जगह को लेकर विवाद।

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