Patna Court Verdict: बिहार में न्याय प्रक्रिया की धीमी गति का एक हैरान कर देने वाला उदाहरण सामने आया है। पटना की एक विशेष अदालत ने लगभग 30 साल तक चले 60 रुपये घूस के एक मामले में बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के तत्कालीन सहायक को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया है। इस पटना कोर्ट के फैसले ने एक बार फिर न्यायिक देरी पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां एक छोटे से आरोप पर सुनवाई पूरी होने में तीन दशक का समय लग गया।
मामले में दो लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिसमें से एक अभियुक्त जगदीश शाह की विचारण के दौरान ही मृत्यु हो गई। विशेष न्यायाधीश अतुल कुमार सिंह की अदालत ने सुनवाई पूरी करने के बाद तत्कालीन सहायक रामायण नारायण सिंह को राहत दी है।
कैसे शुरू हुआ था 30 साल पुराना घूस का ये मामला?
यह मामला 30 सितंबर 1996 को कोतवाली थाने में बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के तत्कालीन सचिव बीएल वैश्ययंत्री द्वारा दर्ज कराए गए आवेदन से शुरू हुआ था। उन्होंने अपनी शिकायत में परीक्षा समिति के तत्कालीन सहायक रामायण नारायण सिंह और भागलपुर प्रमाण पत्र शाखा में कार्यरत जगदीश शाह को आरोपी बनाया था।
आरोप था कि मुजफ्फरपुर निवासी सुमन कुमार के भाई संजय कुमार का वर्ष 1993 का प्रमाण पत्र जारी करने के लिए रामायण नारायण सिंह ने 125 रुपये की मांग की थी। इस प्रमाण पत्र पर कोड संख्या 5122 और क्रमांक 253 दर्ज था। वहीं, दूसरे आरोपी जगदीश शाह पर 60 रुपये घूस लेकर प्रमाण पत्र जारी करने का गंभीर आरोप लगाया गया था।
न्याय की लंबी राह: 30 साल में क्या-क्या हुआ?
इस मामले में पुलिस ने 31 अगस्त 1998 को आरोप पत्र दाखिल किया था। आरोप पत्र दाखिल होने के बाद भी, मामले की सुनवाई में लगभग तीन दशक का समय लग गया। अभियोजन पक्ष की ओर से कुल तीन गवाहों की गवाही कराई गई, लेकिन इतने लंबे समय में साक्ष्य जुटाना एक चुनौती बना रहा।
विचारण के दौरान ही दूसरे आरोपी जगदीश शाह का निधन हो गया, जिससे एक अभियुक्त के खिलाफ सुनवाई पूरी हो पाई। अदालत ने सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद पाया कि रामायण नारायण सिंह के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
विशेष न्यायाधीश अतुल कुमार सिंह की अदालत ने सुनवाई के बाद बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के तत्कालीन सहायक रामायण नारायण सिंह को साक्ष्य के अभाव में रिहा कर दिया।
इस फैसले के साथ, 60 रुपये घूस लेने के आरोप से जुड़ा लगभग तीन दशक पुराना मामला आखिरकार निपट गया। यह घटना बिहार की न्यायिक प्रणाली में लंबित मामलों और न्याय में लगने वाले अत्यधिक समय की गंभीर समस्या को उजागर करती है, जहां छोटे मामलों में भी दशकों लग जाते हैं।

















