Supreme Court Guidelines: देश के सर्वोच्च न्यायालय ने यौन अपराधों से जुड़े मामलों में एक बड़ा और संवेदनशील फैसला सुनाया है। अदालत ने एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट जारी करते हुए न्यायाधीशों को ‘लज्जा भंग’ और ‘बेबस महिला’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बचने की सलाह दी है। इस महत्वपूर्ण कदम का उद्देश्य पीड़ित-केंद्रित न्याय प्रणाली को बढ़ावा देना और यौन हिंसा के शिकार लोगों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करना है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट के माध्यम से स्पष्ट किया है कि अदालती कार्यवाही में अब ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं किया जाएगा, जिससे यौन उत्पीड़न के पीड़ितों की गरिमा को ठेस पहुँचे या उनके प्रति पूर्वाग्रह झलके। पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली समिति ने इन दिशानिर्देशों को तैयार किया है, जिन पर अब सभी जजों को अमल करना होगा।






न्यायाधीशों को किन शब्दों से बचना होगा?
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी नई गाइडलाइंस में जजों को कुछ विशेष शब्दों और वाक्यांशों के प्रयोग से सख्त मना किया गया है। ये शब्द अक्सर यौन अपराधों के मामलों में इस्तेमाल किए जाते रहे हैं, लेकिन ये पीड़ित को और अधिक आहत कर सकते हैं:
‘प्रोसक्यूट्रिक्स’ (शिकायतकर्ता महिला), ‘बेबस महिला’, ‘पवित्रता खो दी’ और ‘लज्जा भंग’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए।
इन शब्दों का प्रयोग अक्सर यौन उत्पीड़न के पीड़ितों को दोषी ठहराने या उनकी स्थिति को कमतर आँकने के लिए किया जाता रहा है। अब इन पर पूर्णतः प्रतिबंध लगा दिया गया है।
पीड़ितों के लिए सम्मानजनक भाषा का निर्देश
गाइडलाइंस में उन तटस्थ और सम्मानजनक शब्दों का भी सुझाव दिया गया है, जिनका इस्तेमाल अब अदालती कार्यवाही में किया जाना चाहिए। यह बदलाव यौन उत्पीड़न के पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण सुधार है।
- पीड़ित: विक्टिम
- उत्तरजीवी: सर्वाइवर
- शिकायतकर्ता: कंप्लेनेंट
- शारीरिक स्वायत्तता: बॉडीली ऑटोनॉमी (शरीर पर अपना अधिकार)
- यौन हमला: सेक्सुअल असॉल्ट
इन शब्दों का प्रयोग यह सुनिश्चित करेगा कि न्यायिक प्रक्रिया में पीड़ित को सम्मान और संवेदनशीलता के साथ देखा जाए। इन दिशानिर्देशों का मुख्य जोर यौन अपराधों से जुड़े फैसलों में अधिक संवेदनशीलता लाने और पीड़ित पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर है।
न्यायपालिका में संवेदनशीलता की नई पहल
जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि न्यायपालिका को यौन अपराधों के मामलों में अपनी भाषा और दृष्टिकोण में बदलाव लाना होगा। यह न केवल कानूनी प्रक्रिया को मजबूत करेगा, बल्कि पीड़ितों को न्याय पाने के लिए एक सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण भी प्रदान करेगा। इस पहल से उम्मीद है कि यौन हिंसा के मामलों में न्यायिक निर्णय अधिक मानवीय और न्यायसंगत होंगे, जिससे समाज में पीड़ितों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी।








