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इमोशनल Euthanasia Movies: ‘गुजारिश’ से ‘सलाम वेंकी’ तक, इन फिल्मों ने झकझोरा दर्शकों का दिल!

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Euthanasia Movies: जीवन और मृत्यु के बीच की इस नाजुक रेखा पर जब इंसान के अस्तित्व का सवाल आता है, तो सिनेमा अक्सर समाज के सामने ऐसे ही गहन मुद्दों को बेबाकी से पेश करता है। भारतीय सिनेमा ने भी इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील विषय पर कई ऐसी फिल्में बनाई हैं, जिन्हें देखकर दर्शक अपने आंसू नहीं रोक पाते।

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# इमोशनल Euthanasia Movies: ‘गुजारिश’ से ‘सलाम वेंकी’ तक, इन फिल्मों ने झकझोरा दर्शकों का दिल!

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सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज का आईना भी है। जब बात इच्छामृत्यु जैसे गंभीर और भावनात्मक विषय की आती है, तो कुछ फिल्में ऐसी छाप छोड़ जाती हैं जो दर्शकों के दिलों-दिमाग में गहरे उतर जाती हैं। ये फिल्में न सिर्फ हमें सोचने पर मजबूर करती हैं, बल्कि जीवन और मृत्यु के मायनों पर भी गंभीर बहस छेड़ती हैं। ‘गुजारिश’ और ‘सलाम वेंकी’ जैसी फ़िल्में इसी श्रेणी में आती हैं, जिन्होंने भारतीय सिनेमा में एक नई मिसाल कायम की।

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ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय बच्चन स्टारर फिल्म ‘गुजारिश’ ने इच्छामृत्यु के विषय को बेहद संजीदगी से पर्दे पर उतारा था। संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक जादूगर एथन मसकरेन्हास की कहानी थी, जो क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित होने के बाद इच्छामृत्यु की मांग करता है। इस फिल्म ने दर्शकों को भावुक कर दिया था और ऋतिक व ऐश्वर्या की अदाकारी ने हर किसी को रुला दिया था। फिल्म ने यह सवाल उठाया कि क्या किसी को अपने जीवन के अंत का चुनाव करने का अधिकार है, जब वह असहनीय पीड़ा में हो।

वहीं, काजोल अभिनीत ‘सलाम वेंकी’ भी एक सच्ची कहानी पर आधारित फिल्म है, जो एक युवा लड़के वेंकी की इच्छामृत्यु की लड़ाई और उसकी मां के अदम्य साहस को दर्शाती है। फिल्म में वेंकी ड्यूकेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नामक बीमारी से पीड़ित है और अपनी गरिमापूर्ण मृत्यु के लिए कोर्ट से अनुमति मांगता है। यह कहानी सिर्फ एक बीमारी से जूझने वाले बच्चे की नहीं, बल्कि एक मां के उस संघर्ष की है जो अपने बच्चे की हर इच्छा पूरी करना चाहती है, भले ही वह कितनी भी दर्दनाक क्यों न हो। यह एक ऐसी Emotional Films है जो आपको अंदर तक छू लेगी।

## Euthanasia Movies: क्या है इच्छामृत्यु और भारतीय कानून?

इच्छामृत्यु, जिसे ‘मर्सी किलिंग’ भी कहते हैं, एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जहां व्यक्ति असाध्य रोग या असहनीय दर्द से मुक्ति पाने के लिए जीवन समाप्त करने की इच्छा व्यक्त करता है। भारत में इच्छामृत्यु को लेकर कानून काफी जटिल और बहस का विषय रहा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ पैसिव इच्छामृत्यु (जहां जीवन रक्षक उपकरण हटा दिए जाते हैं) को कानूनी मान्यता दी है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। सिनेमाई पर्दे पर इस विषय को लाना समाज में जागरूकता बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण तरीका रहा है।

## संवेदनशील कहानियों का सिनेमाई सफर

इच्छामृत्यु पर बनी ये फिल्में सिर्फ कहानियां नहीं, बल्कि समाज और कानून के लिए एक प्रश्नचिह्न भी हैं। ये हमें उन लोगों के दर्द को समझने का मौका देती हैं जो असहनीय पीड़ा से गुजर रहे हैं। इन फिल्मों ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर अपनी पहचान बनाई, बल्कि दर्शकों के दिलों में भी अपनी एक खास जगह बनाई। ये फिल्में इस बात का प्रमाण हैं कि सिनेमा में इतनी शक्ति है कि वह जटिल सामाजिक मुद्दों को आसानी से आम जनता तक पहुंचा सकता है। मनोरंजन जगत की चटपटी खबरों के लिए यहां क्लिक करें। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। ‘गुजारिश’ हो या ‘सलाम वेंकी’, दोनों ही फिल्में बताती हैं कि जिंदगी भले ही दर्दनाक हो, लेकिन उसमें उम्मीद और प्रेम हमेशा बना रहता है। ऐसी Emotional Films हमें जीवन के हर पहलू को गहराई से देखने के लिए प्रेरित करती हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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