Teejan Bai: छत्तीसगढ़ की लोक कला पंडवानी को दुनियाभर में पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का 05 जुलाई को रायपुर में निधन हो गया। 70 वर्ष की आयु में उन्होंने रायपुर एम्स में देर रात 3:15 बजे अंतिम सांस ली। पिछले कुछ समय से वे बीमार थीं। उनके निधन से कला जगत में शोक की लहर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीजन बाई के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है, जो उनके असाधारण योगदान का प्रमाण है।
समाज की बंदिशें तोड़ बनीं ‘पंडवानी की आवाज’
डॉ. तीजन बाई का जीवन संघर्ष और कला के प्रति समर्पण की मिसाल रहा है। उन्हें भारतीय लोक कला में असाधारण योगदान के लिए पद्मश्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। पढ़ाई के नाम पर वे सिर्फ पांचवीं कक्षा तक ही पहुंच पाईं, लेकिन पंडवानी गायन में उनकी ख्याति ऐसी थी कि उन्हें चार बार डी. लिट. की मानद उपाधि भी मिली।
तीजन बाई ने अपने ओजपूर्ण स्वर, अद्भुत अभिनय और प्रभावशाली प्रस्तुति से महाभारत की कथाओं को जन-जन तक पहुंचाया। उनकी पंडवानी शैली केवल गायन नहीं, बल्कि अभिनय, भावाभिव्यक्ति और लोकपरंपरा का अद्वितीय संगम रही। देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर उन्होंने भारतीय लोककला का परचम लहराया और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर नई ऊंचाइयां प्रदान कीं।






तीजन बाई ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्षों के सामने प्रस्तुति दी। उन्हें 1987 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका कला पुरस्कार भी मिला।
तीजन बाई के निधन का समाचार मिलते ही कला, साहित्य, राजनीति और संस्कृति जगत में शोक की लहर दौड़ गई। प्रधानमंत्री सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों, कलाकारों और सांस्कृतिक संस्थाओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनके निधन से भारतीय लोककला ने अपनी एक अमूल्य विभूति खो दी है।
24 अप्रैल, 1956 को भिलाई के गनियारी गांव में चुनुकलाल परधा और सुखवती के घर जन्मी तीजन बाई का बचपन मुश्किलों भरा था। पंडवानी गायिकी के कारण उन्हें समाज से बेदखल कर दिया गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। पारधी जनजाति से आने वाली तीजन अपने नाना ब्रजलाल को महाभारत की कहानियां गाते हुए सुनती थीं, जिससे उन्हें ये कहानियां कंठस्थ हो गईं। गायक उमेद सिंह देशमुख ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें प्रशिक्षण दिया।
महज 13 साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला प्रदर्शन किया। उस दौर में महिला पंडवानी गायिकाएं केवल बैठकर वेदमती शैली में गा सकती थीं, जबकि पुरुष खड़े होकर कापालिक शैली में प्रस्तुति देते थे। तीजन बाई वह पहली महिला थीं, जिन्होंने कापालिक शैली में पंडवानी का प्रदर्शन कर एक नई परंपरा स्थापित की। उन्होंने न केवल इस लोक कला को जीवित रखा, बल्कि उसे वैश्विक स्तर पर पहचान भी दिलाई।
डॉ. तीजन बाई का निधन छत्तीसगढ़ की लोक कला और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के लिए एक बड़ी क्षति है। उनकी अनूठी गायन शैली और मंच पर महाभारत की कहानियों को जीवंत करने की क्षमता हमेशा याद की जाएगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने जताया शोक, कहा- अपूरणीय क्षति
डॉ. तीजन बाई के निधन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपनी संवेदनाएं साझा करते हुए लिखा है कि कला और संस्कृति जगत के लिए यह एक अपूरणीय क्षति है।
सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस लोक कला को अपनी भव्य प्रस्तुति से दुनियाभर में एक विशिष्ट पहचान दिलाई। उनका जाना कला एवं संस्कृति जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। ओम शांति!
प्रधानमंत्री के इस संदेश से तीजन बाई के योगदान की राष्ट्रीय महत्ता स्पष्ट होती है।
अनपढ़ रहकर भी मिलीं पद्मश्री से पद्म विभूषण तक की उपाधियां
तीजन बाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा, लेकिन उनकी प्रतिभा ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान तक पहुंचाया। बचपन में वे कभी स्कूल नहीं जा सकीं। बाद में साक्षरता अभियान के दौरान उन्होंने किसी तरह पांचवीं की सीढ़ी चढ़ी। हालांकि, उनकी पंडवानी इतनी मशहूर हुई कि उन्हें भारत रत्न छोड़कर देश के सभी बड़े पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया था। इसके अलावा, उन्हें चार बार डी. लिट. की मानद उपाधि भी प्रदान की गई थी, जो उनकी असाधारण विद्वत्ता और कला की स्वीकृति थी।
समाज से बहिष्कृत होने के बाद भी नहीं छोड़ा गायन
24 अप्रैल, 1956 को भिलाई के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई के पिता चुनुकलाल परधा और माता सुखवती ने उन्हें जन्म दिया था। पारधी जनजाति से संबंध रखने वाली तीजन बाई की जिंदगी का सफर कभी आसान नहीं रहा। अपनी गायिकी के कारण उन्हें समाज ने बेदखल कर दिया था, लेकिन इस बहिष्कार के बावजूद उन्होंने अपना गाना नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने नाना ब्रजलाल को महाभारत की कहानियां गाते हुए सुना और धीरे-धीरे ये कहानियां उन्हें कंठस्थ हो गईं। उनकी इसी लगन और अप्रतिम प्रतिभा को देखकर गायक उमेद सिंह देशमुख ने उन्हें पंडवानी का प्रशिक्षण दिया।
केवल 13 वर्ष की उम्र में तीजन बाई ने अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया। उस दौर में महिला पंडवानी गायिकाएं केवल बैठकर वेदमती शैली में गायन कर सकती थीं, जबकि पुरुष खड़े होकर कापालिक शैली में प्रदर्शन करते थे। तीजन बाई ने इस रूढ़ि को तोड़ा और वे पहली महिला बनीं जिन्होंने कापालिक शैली में पंडवानी का प्रदर्शन किया, जिससे उन्हें एक अद्वितीय पहचान मिली। उनके निधन से भारतीय लोककला का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया है।








