Silver Price: अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। स्पॉट सिल्वर 3 प्रतिशत से भी ज्यादा गिरकर 59.99 डॉलर प्रति औंस पर आ गया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस ग्लोबल गिरावट का फायदा भारतीय उपभोक्ताओं को मिलेगा? क्या भारत में चांदी सस्ती होगी या महंगी बनी रहेगी? इस जटिल समीकरण को समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि घरेलू बाजार में कई अन्य कारक भी कीमतों को प्रभावित करते हैं।
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अंतर्राष्ट्रीय गिरावट का घरेलू बाजार पर क्या असर?
फिलहाल भारत में एक किलोग्राम चांदी का भाव 2.44 लाख रुपये बताया जा रहा है। अगर हम अंतर्राष्ट्रीय बाजार की गणना करें, तो एक किलोग्राम में लगभग 32.15 ट्रॉय औंस होते हैं। 59.99 डॉलर प्रति औंस के हिसाब से एक किलोग्राम चांदी की अंतर्राष्ट्रीय कीमत लगभग 1,928.73 डॉलर बैठती है। यदि एक डॉलर को 95 रुपये माना जाए, तो रुपये में यह कीमत करीब 1,83,229 रुपये प्रति किलोग्राम होती है।






इसका सीधा मतलब है कि भारतीय बाजार में चांदी का भाव अंतर्राष्ट्रीय आधार मूल्य से लगभग 60,771 रुपये प्रति किलोग्राम ज्यादा है। प्रतिशत में देखें तो यह लगभग 33 प्रतिशत अधिक है। यह अंतर सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय कीमतों से नहीं, बल्कि कई घरेलू कारकों से पैदा होता है।
भारत में क्यों ज्यादा रहती है चांदी की कीमत?
भारत में चांदी की कीमत केवल अंतर्राष्ट्रीय स्पॉट प्राइस से तय नहीं होती। इसमें डॉलर-रुपया विनिमय दर, आयात शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी), वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), लोकल प्रीमियम, परिवहन लागत (ट्रांसपोर्ट कॉस्ट), बीमा (इंश्योरेंस), रिफाइनिंग चार्ज और डीलर मार्जिन जैसे कई अतिरिक्त शुल्क जुड़ते हैं। यही वजह है कि भारत में चांदी का भाव हमेशा ग्लोबल स्पॉट प्राइस से ऊपर बना रहता है।
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चांदी पर दबाव की मुख्य वजह अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर बना डर, मजबूत डॉलर और कीमती धातुओं में व्यापक बिकवाली है।
डॉलर और अमेरिकी ब्याज दरें कैसे बदलती हैं खेल?
जब अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहने या बढ़ने की आशंका बनती है, तो अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है। डॉलर के मजबूत होने से सोना और चांदी जैसी कीमती धातुएं उन खरीदारों के लिए महंगी हो जाती हैं, जो दूसरी मुद्राओं में खरीदारी करते हैं। इससे वैश्विक मांग पर दबाव आता है और कीमतें गिरती हैं। बाजार में ‘रिस्क-ऑफ’ मूड भी एक बड़ी वजह है, जहां निवेशक सुरक्षित संपत्तियों से भी पैसा निकाल रहे हैं, जिससे चांदी में प्रॉफिट बुकिंग देखी जा रही है।
अगर ग्लोबल Silver Price नीचे आती है और डॉलर बहुत ज्यादा मजबूत नहीं होता, तो भारत में चांदी सस्ती हो सकती है। लेकिन, यहां एक बड़ा पेंच है। अगर डॉलर 95 रुपये से बढ़कर 100 रुपये हो जाए, तो वैश्विक गिरावट का पूरा फायदा भारत को नहीं मिल पाएगा, क्योंकि भारत चांदी का बड़ा हिस्सा आयात करता है और महंगा डॉलर आयात लागत बढ़ा देगा।
आगे क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विशेषज्ञों के मुताबिक, जुलाई 2026 तक चांदी में बहुत तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। IG के 2026 आउटलुक के अनुसार, बड़े बैंकों और विश्लेषकों का औसत अनुमान 56 डॉलर से 65 डॉलर प्रति औंस के बीच है, जो मौजूदा स्तर के आसपास चांदी को समर्थन मिलने का संकेत देता है। हालांकि, अगर बाजार में तेजी का माहौल बनता है तो तकनीकी रूप से कीमतें इससे ऊपर भी जा सकती हैं।
J.P. Morgan ने भी अपने 2026 के सिल्वर सेक्टर आउटलुक में औद्योगिक मांग और क्षेत्र से जुड़े फंडामेंटल्स को महत्वपूर्ण बताया है। उनका मानना है कि निकट अवधि में बाजार में उतार-चढ़ाव और प्रॉफिट बुकिंग का दबाव बना रह सकता है।
निष्कर्ष: क्या तुरंत सस्ती होगी चांदी?
सीधे शब्दों में कहें तो, भारत में चांदी के भाव पर इस समय दो विपरीत ताकतें काम कर रही हैं। एक ओर, वैश्विक गिरावट चांदी को सस्ता करने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर, मजबूत डॉलर और घरेलू टैक्स-प्रीमियम भाव को ऊंचा बनाए रख रहे हैं।
इसलिए, यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत में चांदी तुरंत बहुत सस्ती हो जाएगी। हालांकि, अगर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कमजोरी जारी रहती है और डॉलर 95 रुपये के आसपास स्थिर रहता है, तो आने वाले दिनों में भारतीय बाजार में चांदी के भाव पर गिरावट का दबाव साफ दिख सकता है। लेकिन अगर डॉलर और मजबूत होता है, तो गिरावट सीमित रह सकती है या भाव महंगे बने रह सकते हैं।








