Bihar Panchayat Election: बिहार में पंचायत चुनाव 2026 की तैयारियां अब अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रही हैं। राज्य निर्वाचन आयोग और पंचायती राज विभाग इस संबंध में आवश्यक प्रक्रियाओं को तेजी से पूरा कर रहे हैं। इस बार के चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर पंचायतों और क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों का गठन है।
राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत आम निर्वाचन 2026 के लिए कई महत्वपूर्ण आदेश जारी किए हैं। इसके साथ ही, आरक्षण निर्धारण के लिए 2011 की जनसंख्या पर आधारित प्रपत्र-1 का अंतिम प्रकाशन भी किया जा चुका है। ऐसे में, गांव की सरकार का हिस्सा बनने का सपना देख रहे लोगों के लिए पात्रता और नए परिसीमन से जुड़े नियमों को समझना बेहद जरूरी है।

परिसीमन से बदलेगा पंचायतों का नक्शा
बिहार में पिछला पंचायत आम चुनाव 2021 में संपन्न हुआ था और अब 2026 के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। हालांकि, चुनाव की अंतिम तारीख को लेकर अभी कोई स्पष्ट घोषणा नहीं हुई है, लेकिन मौजूदा प्रक्रिया में परिसीमन और उससे जुड़े कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव कार्यक्रम पूरी तरह से परिसीमन की प्रक्रिया के समापन पर निर्भर करेगा। इसलिए, अक्टूबर-नवंबर 2026 में चुनाव होने की चर्चाओं के बीच, आधिकारिक कार्यक्रम की प्रतीक्षा करना उचित होगा।
इस बार पंचायतों का चुनावी गणित 2011 की जनगणना के आंकड़ों से तैयार किया जा रहा है। पंचायती राज विभाग ने जुलाई 2026 में 2011 की जनगणना के आधार पर ग्राम पंचायत, पंचायत समिति के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र और जिला परिषद क्षेत्रों के गठन एवं परिसीमन से संबंधित आदेश जारी किए थे। इसका सीधा असर पंचायतों की सीमा और विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों की संरचना पर पड़ना तय है। परिसीमन के बाद कई पंचायतों का मौजूदा चुनावी ढांचा पूरी तरह बदल सकता है। किसी क्षेत्र की सीमा में परिवर्तन हो सकता है, वहीं आबादी के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन भी संभव है।
आरक्षण और मुखिया पदों की संख्या पर असर
आरक्षण की स्थिति भी नए आंकड़ों के आधार पर ही तय की जा रही है। राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार, पंचायत आम निर्वाचन 2026 के लिए आरक्षण निर्धारण में 2011 की जनसंख्या को आधार बनाया गया है। 2021 के पंचायत चुनाव में बिहार में 8,058 मुखिया निर्वाचित हुए थे। राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों में मुखिया पद के लिए इतनी ही संख्या का उल्लेख है। इसलिए, नए परिसीमन के बाद मुखिया पदों की संख्या को लेकर चल रही चर्चाओं पर अंतिम तस्वीर आधिकारिक अधिसूचना के बाद ही साफ होगी। लगभग 13 हजार पद होने की संभावना का दावा अभी अंतिम सरकारी संख्या नहीं माना जा सकता।
मुखिया बनने के लिए पात्रता के नए नियम
पंचायत चुनाव में मुखिया पद के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित है। इसका अर्थ है कि नामांकन के समय उम्मीदवार की उम्र कम से कम 21 साल होनी चाहिए। इससे कम उम्र का व्यक्ति मुखिया पद के लिए चुनाव नहीं लड़ सकता। राज्य निर्वाचन आयोग के पिछले पंचायत चुनाव के आंकड़ों में 21 वर्ष की उम्र वाले मुखिया निर्वाचित प्रतिनिधि भी दर्ज हैं।
- मतदाता सूची में नाम: उम्मीदवार का नाम संबंधित पंचायत के निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में होना अनिवार्य है। राज्य निर्वाचन आयोग के नामांकन प्रपत्र में भी उम्मीदवार को संबंधित ग्राम पंचायत के निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज होने की घोषणा करनी होती है। केवल किसी पंचायत में रहने का दावा पर्याप्त नहीं होगा; मतदाता सूची से जुड़ी पात्रता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- सरकारी सेवा और लाभ का पद: सरकारी सेवा या पंचायत के अधीन लाभ के पद से जुड़े मामलों में भी उम्मीदवार को चुनावी नियमों का पालन करना होता है। जिस पद के कारण कानून के तहत अयोग्यता बनती है, वहां पद पर रहते हुए चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं होती। ऐसे मामलों में नामांकन से पहले संबंधित सेवा और निर्वाचन नियमों की स्थिति देखना आवश्यक है।
- अन्य अयोग्यताएं: अदालत द्वारा मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित व्यक्ति चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो सकता है। इसी तरह, गंभीर आपराधिक मामले में दोषसिद्धि होने पर भी कानून के तहत अयोग्यता लागू हो सकती है। आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को संबंधित आरक्षित वर्ग की पात्रता पूरी करनी होगी।
अतः, 2026 के पंचायत चुनाव में सिर्फ 21 साल की उम्र पूरी करना ही पर्याप्त नहीं होगा। मतदाता सूची में नाम, संबंधित निर्वाचन क्षेत्र की पात्रता और किसी भी वैधानिक अयोग्यता का न होना भी महत्वपूर्ण होगा। नामांकन के समय उम्मीदवारों को निर्धारित दस्तावेज और घोषणा पत्र भी प्रस्तुत करना होगा। अंतिम शर्तें चुनाव की अधिसूचना और लागू कानूनों के अनुसार ही तय होंगी।
बिहार में पंचायत चुनाव 2026 की तैयारियां अब कागजी प्रक्रिया से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर असर डाल रही हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़े इस्तेमाल किए जा रहे हैं, आरक्षण से जुड़े आंकड़े प्रकाशित किए जा चुके हैं और मतदाता सूची से जुड़े काम भी चुनावी प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा हैं। अब सभी की नजरें परिसीमन की अगली प्रक्रिया और चुनाव कार्यक्रम की आधिकारिक घोषणा पर टिकी हैं।







