Bihar Gandhi Shiv: गांधी जयंती के अवसर पर पटना के ऐतिहासिक गांधी शिविर की बदहाली देखकर शायद हर कोई शर्मिंदा महसूस करेगा। आजादी के निर्णायक दौर में, जिस स्थान पर महात्मा गांधी ने बिहार में शांति और सामाजिक सद्भाव स्थापित करने के लिए लगभग 65 दिन बिताए थे, वह आज उपेक्षा और सरकारी लापरवाही का शिकार है। जिस कमरे में बापू रहा करते थे, वहां सीलन है और छत से पानी टपक रहा है, जो विरासत के प्रति उदासीनता को दर्शाता है।
बापू के कमरे में सीलन, छत से टपकता पानी: उपेक्षा की कहानी
गांधी शिविर की वर्तमान स्थिति अत्यंत दयनीय है। महात्मा गांधी जिस कमरे में ठहरे थे, वहां की दीवारों पर सीलन साफ नजर आती है और छत से लगातार पानी टपक रहा है। मुख्य प्रवेश द्वार पर काई जम गई है, जो रखरखाव की कमी को स्पष्ट करती है। हैरानी की बात यह है कि दो साल पहले तक यहां कोई शिलापट्ट नहीं था, लेकिन अब दो शिलापट्ट ईंटों के सहारे लगाए गए हैं।
इनमें से एक शिलापट्ट पर गांधी शिविर संरचना का उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा 15 मई 2015 को किए जाने का उल्लेख है। वहीं, दूसरे शिलापट्ट पर जीर्णोद्धार कार्य का शुभारंभ 8 सितंबर 2026 दर्ज है, जो कि भविष्य की तारीख है और स्पष्ट रूप से एक त्रुटि प्रतीत होती है। हालांकि, अभिलेखों के अनुसार, जीर्णोद्धार का काम 8 सितंबर 2014 को शुरू हुआ था। जहां बापू बैठकर लोगों को संबोधित करते थे, वहां आज टूटी हुई पेड़ की टहनियां बिखरी पड़ी हैं।
आजादी के निर्णायक दौर का गवाह: गांधी का बिहार कनेक्शन
यह ऐतिहासिक भवन तत्कालीन समय में डॉ. सैयद महमूद का आवास था। महात्मा गांधी यहां दो चरणों में ठहरे थे। पहली बार वे 5 मार्च 1947 से 30 मार्च 1947 तक रहे, और दूसरी बार 14 अप्रैल 1947 से 24 मई 1947 तक। इन महत्वपूर्ण दिनों में, यह स्थान बिहार की तत्कालीन परिस्थितियों पर गहन विमर्श, शांति प्रयासों और व्यापक जनसंपर्क का केंद्र बना रहा।
गांधी जी अपने सहयोगियों निर्मल कुमार बोस, मनु गांधी, सैयद अहमद, देव प्रकाश नायर और सैयद मुज्तबा के साथ यहां रुके थे। खान अब्दुल गफ्फार खां भी पटना आकर गांधी जी के साथ इसी स्थान पर ठहरे थे। बापू ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद और डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह सहित बिहार के कई प्रमुख नेताओं से मुलाकात कर उस समय की स्थिति की जानकारी ली थी और गांव-गांव जाकर शांति का संदेश दिया था।
जीर्णोद्धार पर करोड़ों खर्च, फिर भी बदहाली क्यों?
गांधी शिविर की ऐतिहासिक महत्ता को देखते हुए, बिहार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के तहत बिहार राज्य भवन निर्माण निगम लिमिटेड ने इसके जीर्णोद्धार की योजना बनाई थी। अभिलेखों के अनुसार, 8 सितंबर 2014 को गांधी संग्रहालय के सचिव रजी अहमद ने गांधी शिविर संरचना के जीर्णोद्धार कार्य का शुभारंभ किया था। इस मौके पर कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के तत्कालीन सचिव चंचल कुमार भी मौजूद थे।
योजना के तहत काम पूरा होने के बाद, 15 मई 2015 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गांधी शिविर संरचना का उद्घाटन किया। उस समय भवन निर्माण विभाग के मंत्री दामोदर रावत और कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के मंत्री राम लषण राम रमण भी उपस्थित थे। उद्घाटन को एक दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आज भी यह स्थल उपेक्षा का शिकार है।
माफ करना बापू, हम शर्मिंदा हैं! गांधी जयंती पर पटना के उस ऐतिहासिक गांधी शिविर को देखकर शायद यही शब्द निकलते हैं, जहां महात्मा गांधी ने आजादी के निर्णायक दौर में बिहार में शांति और सामाजिक सद्भाव कायम करने के लिए करीब 65 दिन बिताये थे।
गांधी शिविर अनुग्रह नारायण सिन्हा सामाजिक अध्ययन शोध संस्थान के तहत आता है। सरकारी स्तर पर जीर्णोद्धार और उद्घाटन हुए एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस धरोहर को गांधी जी की स्मृति से जोड़कर संरक्षित किया गया था, उसके नियमित रखरखाव और संरक्षण की जिम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभाई जा रही है। इस ऐतिहासिक स्थल की बदहाली को दूर करने के लिए तत्काल ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि यह भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहे।






