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TMBU शिक्षक बहाली में बड़ा झोल? अब निगरानी विभाग करेगा पूरी जांच, कई बड़े नामों पर गिर सकती है गाज

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भागलपुर न्यूज़: तिलका मांझी यूनिवर्सिटी में हुई एक बहाली अब बड़े झमेले में फंस गई है. पर्दे के पीछे ऐसा क्या खेल हुआ कि सीधे जांच के लिए निगरानी विभाग को बुलाना पड़ा? अब जब फाइलें खुलेंगी तो कई बड़े चेहरों पर से नकाब हटने की आशंका जताई जा रही है.

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सवालों के घेरे में अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति

तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) में हाल ही में हुई अतिथि शिक्षकों (Guest Teachers) की बहाली प्रक्रिया गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है. नियुक्ति प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों और अनियमितताओं की शिकायतों के बाद अब इस मामले की जांच निगरानी विभाग (Monitoring Department) करेगा. इस फैसले ने विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर अकादमिक गलियारों तक में हड़कंप मचा दिया है.

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जानकारी के अनुसार, अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर विश्वविद्यालय पर अपारदर्शिता और नियमों की अनदेखी के आरोप लग रहे थे. मामला जब उच्च अधिकारियों तक पहुंचा तो इसकी संवेदनशीलता को देखते हुए गहन जांच के लिए इसे निगरानी विभाग को सौंपने का निर्णय लिया गया. यह कदम इस बात का संकेत है कि अधिकारी इन आरोपों को बेहद गंभीरता से ले रहे हैं.

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क्या है पूरा मामला और क्यों हो रही है जांच?

विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए एक निश्चित मानदेय पर अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है. टीएमबीयू में भी इसी प्रक्रिया के तहत बहाली की गई थी. हालांकि, नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने के बाद से ही इसमें धांधली के आरोप लगने शुरू हो गए थे. सूत्रों का कहना है कि कई योग्य उम्मीदवारों को नजरअंदाज कर दिया गया और चयन प्रक्रिया में मनमानी की गई.

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निगरानी विभाग अब इन सभी पहलुओं की जांच करेगा. जांच के मुख्य बिंदु हो सकते हैं:

  • क्या बहाली प्रक्रिया में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के दिशानिर्देशों का पालन किया गया?
  • आरक्षण रोस्टर का सही ढंग से अनुपालन हुआ या नहीं?
  • चयन समिति ने उम्मीदवारों के चयन में कितनी पारदर्शिता बरती?
  • क्या किसी भी स्तर पर भाई-भतीजावाद या पक्षपात किया गया?
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जांच की आंच से विश्वविद्यालय में बेचैनी

निगरानी विभाग की जांच का मतलब है कि बहाली से जुड़ी सभी फाइलें, आवेदन पत्र, मेरिट लिस्ट और चयन समिति की बैठकों के रिकॉर्ड खंगाले जाएंगे. इस प्रक्रिया में शामिल विश्वविद्यालय के अधिकारियों और चयन समिति के सदस्यों से भी पूछताछ की जा सकती है. अगर जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो न केवल नियुक्तियां रद्द हो सकती हैं, बल्कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जा सकती है.

इस पूरे प्रकरण ने विश्वविद्यालय की साख पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. अब सभी की निगाहें निगरानी विभाग की जांच पर टिकी हैं. देखना यह होगा कि इस जांच के बाद क्या सच्चाई सामने आती है और विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं.

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