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शर्मनाक! Darbhanga में बच्चों के निवाले पर संकट, आंगनबाड़ी सेविकाएं 6 महीने से भूखी!

Bihar Anganwadi News: भूख और कुपोषण से लड़ने वाली महत्वाकांक्षी योजना खुद कुपोषण का शिकार बन गई है। बेनीपुर में 274 आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों को दो माह से भोजन नहीं मिला, जबकि सेविका-सहायिकाएं भी 6 महीने से खाली हाथ हैं।

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Bihar Anganwadi News: बिहार के बेनीपुर प्रखंड में आंगनबाड़ी केंद्रों की महत्वाकांक्षी योजना अब खुद भूख और कुपोषण का शिकार बनती दिख रही है। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा पोषित बाल विकास परियोजना के तहत संचालित आंगनबाड़ी केंद्र अपने मूल उद्देश्य से भटक गए हैं। जहां छोटे बच्चों को दो माह से निवाला नहीं मिल रहा है, वहीं उन्हें भूख-कुपोषण से बचाने वाली आंगनबाड़ी सेविकाएं और सहायिकाएं पिछले छह महीने से बिना मानदेय के काम करने को मजबूर हैं।

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यह स्थिति सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही को उजागर करती है, जहां उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर चलने वाली महत्वपूर्ण योजना राशि के अभाव में ठप पड़ गई है। बेनीपुर प्रखंड में कुल 274 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। इन केंद्रों पर प्रत्येक सेविका और सहायिका को 30 प्रारंभिक कक्षा के छात्रों के साथ-साथ गर्भवती, प्रसूति महिलाओं और कुपोषित बच्चों को पोषाहार के रूप में पका हुआ भोजन और टेक होम राशन देने का प्रावधान है।

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6 महीने से नहीं मिला मानदेय, भुखमरी की कगार पर सेविकाएं

आंगनबाड़ी सेविका को मासिक मानदेय के रूप में 9000 रुपये और सहायिका को 4500 रुपये मिलते हैं। लेकिन पिछले छह माह से इन्हें एक भी पैसा नहीं मिला है। अपनी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर कई सेविकाओं ने बताया कि वे विभागीय नियमों से बंधी हुई हैं और निर्देशानुसार काम कर रही हैं, लेकिन मानदेय न मिलने से उनकी अपनी आर्थिक स्थिति बिगड़ गई है। वे खुद कुपोषित होने की कगार पर पहुंच गई हैं।

नाम न छापने की शर्त पर एक सेविका ने कहा, ‘हम लोग विभागीय नियम से बंधे हुए हैं, विभागीय निर्देश के अनुसार काम कर रहे हैं। पोषाहार नहीं मिलने के कारण बच्चों की उपस्थिति पर तो प्रतिकूल प्रभाव पड़ ही रहा है। ऊपर से ग्रामीण महिला लाभार्थी द्वारा खरी-खोटी अलग से सुनाई जा रही है, लेकिन हम लोग अपने पदाधिकारी को सूचना देने के अतिरिक्त कर ही क्या सकती हैं।’

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दो माह से ठप पोषाहार योजना, कैसे दूर होगा कुपोषण?

बच्चों के पोषाहार के लिए प्रत्येक महीने में आंगनबाड़ी सेविका के खाते में 4000 रुपये से लेकर 22000 रुपये तक (लाभार्थी के अनुपात में) का भुगतान किया जाता है। लेकिन पिछले दो महीनों से यह भुगतान भी ठप है। जून माह में आवंटन के अभाव में विभागीय अधिकारियों के निर्देश पर सभी लाभार्थियों का एफआरएस सिस्टम के माध्यम से पहचान कर उन्हें लाभान्वित करने की प्रक्रिया पूरी कर ली गई थी, जबकि सेविका के खाते में विभाग द्वारा फूटी कौड़ी भी नहीं दी गई।

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एफआरएस की प्रक्रिया पूरी होने के बाद लाभार्थियों को 25 दिन का राशन मिलने की सूचना मोबाइल ऐप के माध्यम से दी जा रही है। हालांकि, न तो सरकार से विभाग को आवंटन प्राप्त हुआ और न ही सेविका के खाते में राशि का भुगतान किया गया। जुलाई माह का पहला सप्ताह बीत चुका है, जबकि हर माह की 15 तारीख को टेक होम राशन वितरित किए जाने का प्रावधान है। वर्तमान समय तक सेविका के खाते में राशि का स्थानांतरण हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है।

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अधिकारियों ने झाड़ा पल्ला, आवंटन के इंतजार में लाखों लाभार्थी

इस गंभीर स्थिति पर बाल विकास परियोजना पदाधिकारी रंजीत कुमार ने दबी जुबान से बताया कि पिछले माह पोषाहार मद का विपत्र कोषागार भेजा गया था, लेकिन आज तक वह पारित होकर बैंक को नहीं भेजा गया है। नतीजतन, पोषाहार योजना ठप पड़ी हुई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आंगनबाड़ी सेविका एवं सहायिका के मानदेय भुगतान में स्थानीय कार्यालय का कोई योगदान नहीं होता है। कार्यालय द्वारा प्रत्येक माह केवल उपस्थिति विवरण विभाग को भेजा जाता है, और विभाग द्वारा डीबीटी के माध्यम से मानदेय का भुगतान किया जाता है।

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मौजूदा हालात को देखते हुए इस माह भी नौनिहालों को उनका निवाला नहीं मिल पाने की प्रबल संभावना है। यह स्थिति न केवल बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालेगी, बल्कि सरकार की भूख और कुपोषण मुक्त बिहार की प्रतिबद्धता पर भी सवाल खड़े करती है। विभाग और सरकार को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप कर आवंटन जारी करना चाहिए ताकि हजारों बच्चों और उनकी देखभाल करने वाली सेविकाओं को राहत मिल सके।

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